जॉन लॉक का सामाजिक समझौता सिद्धान्त

 B. A. II, Political Science I

प्रश्न 9.लॉक के प्राकृतिक अधिकारों तथा सम्पत्ति सम्बन्धी सिद्धान्त की समीक्षा कीजिए।

अथवा '' लॉक के सामाजिक समझौता सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए तथा उसकी विशेषताएँ बताइए।

उत्तर - उदारवाद के समर्थकों में जॉन लॉक सबसे अधिक महत्त्वपर्ण है। लॉक का जन्म प्यूरिटन सम्प्रदाय के एक मध्यवर्गीय परिवार में 1632 ई. में हआ था। उसने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की। 1704 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

लॉक की रचनाएँ-लॉक की महत्त्वपूर्ण रचनाएँ निम्नलिखित हैं

(1) A Letter on Toleration

(2) Two Treatises on Government

(3) Essay Concerning Human Understanding

लॉक का सामाजिक समझौता सिद्धान्त

लॉक की राजनीतिक विचारधारा में सर्वप्रथम स्थान उसके सामाजिक समझौता सिद्धान्त का है, जिसका वर्णन उसने विभिन्न चरणों में किया है

मानव स्वभाव-

लॉक का दर्शन उसके मानव स्वभाव सम्बन्धी दृष्टिकोण पर आधारित है। हॉब्स के सर्वथा विपरीत लॉक मानव स्वभाव को स्वाभाविक रूप से अच्छा बताता है और उसके मानवीय गुणों पर बल देता है। वह मनुष्य को एक विवेकशील प्राणी मानता है और कहता है कि विवेकपूर्ण होने के कारण वह स्वेच्छापूर्वक नैतिक व्यवस्था को स्वीकार कर उसके अनुसार जीवन व्यतीत करना अपना परम कर्त्तव्य मानता है।

जॉन लॉक का सामाजिक समझौता सिद्धान्त

प्राकृतिक अवस्था-

लॉक ने हॉब्स के विपरीत प्राकृतिक अवस्था का सुनहरा चित्रण किया है। उसके अनुसार यह अवस्था युद्ध की नहीं, बल्कि शान्ति, सद्भावना, पारस्परिक सहायता, रक्षा आदि की अवस्था थी। मनुष्य शान्ति के साथ निवास करते थे। वे पूर्ण स्वतन्त्र थे और अपनी इच्छानुसार जीवनयापन करते थे।

प्राकृतिक अवस्था के सम्बन्ध में लॉक मानता है कि यह अवस्था शान्ति, सम्पन्नता, सहयोग, समानता तथा स्वतन्त्रता की अवस्था थी। लॉक के अनुसार, "यद्यपि प्राकृतिक अवस्था स्वतन्त्रता की अवस्था है, तथापि यह स्वेच्छाचारिता की अवस्था नहीं है। यद्यपि इस अवस्था में मनुष्य को अपने व्यक्तित्व या सम्पत्ति के प्रयोग की अमर्यादित स्वतन्त्रता है, पर उसे तब तक अपने को या अपने अधीन किसी प्राणी को नष्ट करने की स्वतन्त्रता नहीं है जब तक कि ऐसा करने की आवश्यकता जिन्दगी बनाए रखने से अधिक अच्छे उद्देश्य के लिए न हो।"

प्राकृतिक अधिकार-

लॉक के अनुसार प्राकृतिक अवस्था का संचालन प्राकृतिक नियमों के अनुसार होता था तथा व्यक्ति को इन प्राकृतिक नियमों के अनसार ही प्राकतिक अधिकार प्राप्त थे। ये प्राकृतिक अधिकार तीन प्रकार के थे

(1) जीवन का अधिकार-

जीवन के अधिकार की व्याख्या करते हुए लॉक कहता है कि स्वयं के जीवन को सुरक्षित करना मनुष्य की सबसे प्रबल आकांक्षा होती है और उसके सब कार्यों की प्रेरणा। अत: अपने जीवन को सरक्षित करने के लिए जो भी विवेकपूर्ण कार्य एक व्यक्ति के द्वारा किए जाते हैं, उन्हें करने का उसे प्राकृतिक अधिकार प्राप्त है।

(2) स्वतन्त्रता का अधिकार-

लॉक के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में प्राकृतिक नियमों के द्वारा स्थापित नैतिक व्यवस्था के अनुसार कार्य करना हो स्वतन्त्रता है। अत: प्रत्येक व्यक्ति को नैतिक सीमाओं में रहते हुए अपनी स्वतन्त्रता का उपयोग करने का प्राकृतिक अधिकार प्राप्त है।

(3) सम्पत्ति का अधिकार-

लॉक सम्पत्ति के अधिकार की व्याख्या करते हुए कहता है कि प्रारम्भ में सभी व्यक्तियों का प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं पर समान अधिकार था। अत: सम्पूर्ण सम्पत्ति सामूहिक सम्पत्ति थी। किन्तु जब कोई व्यक्ति इन प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं को अपने श्रम से उपयोगी बना लेता है, तो उन पर उसका व्यक्तिगत अधिकार हो जाता है। इस प्रकार मनुष्य के श्रम के माध्यम से व्यक्तिगत सम्पत्ति का निर्माण होता है। लॉक आगे कहता है कि व्यक्ति को उतनी सम्पत्ति रखनी चाहिए जिसका कि वह उपयोग कर सके।

लॉक द्वारा सम्पत्ति के अधिकार को महत्त्व दिए जाने की ओर संकेत करते हुए सेबाइन ने लिखा है कि "यह एक ऐसा अधिकार है जो प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के अभिन्न अंग के रूप में लेकर समाज में आता है। अतः समाज इस अधिकार की सृष्टि नहीं करता और कुछ सीमाओं को छोड़कर उसका नियमन भी नहीं कर सकता। इसका कारण यह है कि समाज और शासन, दोनों का उद्देश्य सम्पत्ति के पूर्ववर्ती प्राकृतिक अधिकार की रक्षा करना है।"

प्राकृतिक अवस्था की कठिनाइयाँ-

प्राकृतिक अवस्था में कुछ ऐसी कठिनाइयाँ और असुविधाएँ थीं जिनके कारण व्यक्ति निरन्तर असुरक्षा और अशान्ति के भय का अनुभव करता रहता था। प्राकृतिक अवस्था में मुख्य रूप से तीन असुविधाएँ थीं। पहली असुविधा प्राकृतिक अवस्था में यह थी कि प्राकृतिक नियमों का स्वरूप बड़ा ही अस्पष्ट था। मनुष्य की बुद्धि में भेद होने के कारण उसके द्वारा उसकी व्याख्या और अर्थ भी भिन्न-भिन्न प्रकार से किया जाता था। दसरी असुविधा यह थी कि प्राकृतिक नियम की सही परिभाषा करने वाला और उसके अनुसार निर्णय कर उसे कार्यान्वित करने वाला कोई साधन या संस्था उपलब्ध नहीं थी। 

तीसरी सबसे बड़ी असुविधा यह थी कि प्राकृतिक अवस्था में प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों को दण्ड देने के लिए कोई एक व्यक्ति या संगठन उत्तरदायी नहीं था। यह अधिकार सभी व्यक्तियों को प्राप्त था। फलत: उसके प्रयोग में न तो एकरूपता और न निकाला सम्भव थी।

सामाजिक समझौता-

प्राकृतिक अवस्था की कठिनाइयों को दूर करने और अपनी सम्पत्ति को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से आदिम मनुष्यों ने नागरिक समाज की स्थापना करने का निर्णय लिया। इसके लिए मनुष्यों ने दो प्रकार के समझौते किए। यद्यपि लॉक ने स्पष्टतया ऐसे दो समझौतों का उल्लेख नहीं किया है, किन्तु उसके वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि दो समझौते किए गए। इनमें से पहला समझौता सामाजिक समझौता और दूसरा समझौता राजनीतिक समझौता था। पहला समझौता व्यक्तियों में हुआ। 

इस समझौते के अनुसार प्राकृतिक अवस्था का अन्त करके समाज की स्थापना की गई। इसमें प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से समाज की स्थापना और प्राकृतिक अधिकारों को प्राकृतिक नियमों के अनुसार मनवाने के लिए समझौता करता है। लॉक के अनुसार, "व्यक्ति के जीवन, सम्पत्ति और स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए समाज की स्थापना होती है। व्यक्ति ने अपने समस्त अधिकार समाज को नहीं दिए, बल्कि जीवन, सम्पत्ति और स्वतन्त्रता की रक्षा का भार समाज को सौंपा है। जो कोई इन अधिकारों का उल्लंघन करेगा, समाज उसको दण्ड देगा।" दूसरा समझौता शासक तथा जनता के मध्य हुआ। दूसरे समझौते (राजनीतिक समझौते) के आधार पर सरकार बनाई गई, जिसे कुछ अधिकार सौंपे गए।

परन्तु लॉक के सामाजिक समझौते में शासक को अमर्यादित शक्ति प्रदान नहीं की गई है। शासक की शक्ति पर यह प्रतिबन्ध लगा दिया गया है कि उसके द्वारा निर्मित कानून प्राकृतिक नियमों के अनुकूल होंगे। लॉक का कथन है कि "व्यक्ति अपनी सम्पत्ति की रक्षा के लिए राजनीतिक समाज में प्रवेश करते हैं।" सम्पत्ति के अन्तर्गत जीवन, स्वास्थ्य तथा स्वतन्त्रता भी सम्मिलित है 

और लॉक की धारणा है कि प्राकृतिक अवस्था में व्यक्तियों को जो अधिकार प्राप्त थे, समाज उनकी सुरक्षा सामूहिक रूप से और सामूहिक हितों को ध्यान में रखते हुए करेगा।

इस प्रकार सरकार व्यक्तियों के जीवन, स्वतन्त्रता और सम्पत्ति की रक्षा की गारण्टी लेती है। इस समझौते में यह भी निश्चित किया गया कि यदि शासक समझौते की शर्तों का उल्लंघन करे अथवा सार्वजनिक हित के विरुद्ध शासन करे, तो मनुष्यों को अधिकार होगा कि वे उससे राजशक्ति छीन लें और उसके स्थान पर किसी दूसरे शासक की नियुक्ति करें, जो समझौते की शर्तों के अनकल सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए शासन करे।

लॉक के सामाजिक समझौते की विशेषताएँ

लॉक द्वारा प्रतिपादित समझौते के विश्लेषण से उसकी निम्नलिखित विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं

(1) इस समझौते के द्वारा व्यक्ति हॉब्स की भाँति अपने सभी अधिकारों का त्याग नहीं करते। वे केवल प्राकृतिक कानून को व्याख्या करने, उसे कार्यान्वित करने तथा भंग करने वाले को दण्ड देने के अधिकार का ही परित्याग करते हैं। वे जीवन, स्वतन्त्रता और सम्पत्ति के अधिकार अपने पास सुरक्षित रखते हैं और उनके द्वारा राजनीतिक नियन्त्रण को सीमित करते हैं।

(2) लाँक द्वारा प्रतिपादित समझौते के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाला समाज और राज्य हॉम के लेवियाथन जैसा असीम अधिकार सम्पन्न, सर्वशक्तिशाली तथा सम्पूर्ण प्रभुतासम्पन्न नहीं है, वरन् वह दोहरे नियन्त्रण से युक्त है। पहला नियन्त्रण तो व्यक्ति का जीवन, स्वतन्त्रता और सम्पत्ति के आदेय अधिकार हैं और दूसरा नियन्त्रण प्राकृतिक नियम हैं, जिनसे स्वयं राज्य भी बँधा हुआ है। इस ओर संकेत करते हुए लॉक स्वयं कहता है कि "प्राकृतिक नियम के बन्धनों का राजनीतिक समाज में अन्त नहीं होता है।" 

अत: लॉक का समाज हॉब्स के समाज के समान असीमित और अमर्यादित अधिकार और सत्ता से सम्पन्न नहीं है। यदि वह अपने अधिकारों और प्राकृतिक नियमों का अतिक्रमण करके अपने कर्तव्यों से विमुख होता है, तो ऐसी स्थिति में जनता उसके विरुद्ध विद्रोह करने का अधिकार रखती है।

(3) यह एक सर्वसम्मत समझौता है, जो जन इच्छा और सहमति पर आधारित है। कोई भी बिना सहमति इस नवीन समाज में प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि लॉक की यह मान्यता है कि सहमति ही विश्व में प्रत्येक वैध सरकार का निर्माण करती है।

(4) लॉक का समझौता एक बार सम्पन्न होने पर रद्द नहीं हो सकता। लेकिन यह उसी तरह से बाद की पीढ़ियों पर लागू नहीं माना जा सकता, जिस तरह से यह इसे सम्पन्न करने वालों पर लागू होता है। बाद की पीढ़ियों की समझौते के प्रति स्वीकृति जानने के लिए लॉक यह सुझाव देता है कि यदि बाद की पीढियाँ समझौते के द्वारा स्थापित व्यवस्था को स्वीकार करती हैं, तो इसे उनको स्वीकृति समझी जानी चाहिए।

(5) लॉक का समाज सर्वसम्मति से निर्मित समाज है। सर्वसम्मति का यह सिद्धान्त बहमत के शासन के सिद्धान्त को जन्म देता है, क्योंकि प्रत्येक प्रश्न पर सर्वसम्मति प्राप्त करना व्यावहारिक नहीं है। अत: उसके सम्बन्ध में निर्णय बहमत के माध्यम से ही किया जा सकता है।

लॉक के सामाजिक समझौते की उपर्युक्त विशेषताओं से स्पष्ट है कि लॉक ने अपने सिद्धान्त के आधार पर एक ऐसे समाज का समर्थन किया है जिसमें वास्तविक एवं अन्तिम शक्ति अर्थात् सम्प्रभुता समष्टि रूप से समाज में निहित होती है तथा सरकार का चाहे कोई भी स्वरूप क्यों न हो, वह समाज की इच्छा की अभिव्यक्ति का एक ऐसा साधन मात्र होती है जिसे समाज जब चाहे बदल सकता है।

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