नेपोलियन बोनापार्ट - साम्राज्य का पतन


M.J.P.R.U.,B.A.II,History II / 2020 
प्रश्न 6. "स्पेन के नासूर ने मेरा सर्वनाश किया।" नेपोलियन बोनापार्ट के इस कथन की व्याख्या कीजिए। 
अथवा  "प्रायद्वीपीय युद्ध ने नेपोलियन बोनापार्ट के साम्राज्य के पतन में सहायता प्रदान की।" स्पष्ट कीजिए।
अथवा  "स्पेन के नासूर ने मेरा अन्त कर दिया।" नेपोलियन बोनापार्ट के इस कथन की पुष्टि कीजिए।
अथवा ''प्रायद्वीपीय युद्ध से आप क्या समझते हैं ? इसके कारणों पर प्रकाश डालिए। प्रायद्वीपीय युद्ध में नेपोलियन बोनापार्ट की असफलता के क्या कारण थे ?

नेपोलियन बोनापार्ट - साम्राज्य का पतन 

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उत्तर - टिलसिट की सन्धि के पश्चात् नेपोलियन बोनापार्ट यूरोप की प्रमुख शक्तियों में से एक बन चुका था। लगभग सम्पूर्ण यूरोप उसके प्रभाव क्षेत्र में था, किन्तु इंग्लैण्ड ने फ्रांस की अधीनता स्वीकार नहीं की थी। इस प्रकार इंग्लैण्ड नेपोलियन बोनापार्ट के लिए एक चुनौती बना हुआ था। इंग्लैण्ड की शक्तिशाली नौसेना के होते हुए इंग्लैण्ड को परास्त करना नेपोलियन बोनापार्ट के लिए सम्भव न था। नेपोलियन बोनापार्ट भी इस कटु तथ्य को समझ चुका था। अतः उसने इंग्लैण्ड को आर्थिक युद्ध के द्वारा परास्त करना चाहा। इसी उद्देश्य से नेपोलियन बोनापार्ट ने 'महाद्वीपीय व्यवस्था' (Continental System) की घोषणा की। नेपोलियन बोनापार्ट ने यूरोप के अन्य देशों से भी यह अपेक्षा की कि वे उस महाद्वीपीय व्यवस्था को स्वीकार करें जिसके द्वारा इंग्लैण्ड का आर्थिक बहिष्कार किया जाना था। यूरोप के अनेक राज्य इसके पक्ष में न थे, किन्तु नेपोलियन बोनापार्ट के भय से वे ऐसा करने के लिए विवश थे। पुर्तगाल ने भी इस महाद्वीपीय व्यवस्था का विरोध किया। कुछ समय तक तो पुर्तगाल ने इंग्लैण्ड से व्यापार बन्द कर दिया, किन्तु शीघ्र ही उसने इंग्लैण्ड से व्यापारिक सम्बन्ध पुनः जोड़ लिए। पुर्तगाल ने इंग्लैण्ड के जहाजों को अपने बन्दरगाहों में शरण भी दी। नेपोलियन बोनापार्ट ने अपनी आज्ञा की अवहेलना होते देखकर अपने सेनापति जूनो (Junot) को पुर्तगाल पर आक्रमण करने के लिए भेजा। जूनो ने 1 दिसम्बर, 1807 को पुर्तगाल पर अधिकार कर लिया। पुर्तगाल के राजा ने ब्राजील में शरण प्राप्त की। यद्यपि इस युद्ध का विशेष सामरिक महत्त्व नहीं है, किन्तु राजनीतिक दृष्टि से यह महत्त्वपूर्ण था। इस युद्ध को स्पेन पर होने वाले आक्रमण की भूमिका कहा जा सकता है। पुर्तगाल पर पूर्णतया अधिकार बनाए रखने के लिए स्पेन पर अधिकार करना आवश्यक था। यद्यपि 1795 ई. में स्पेन ने फ्रांस के प्रभुत्व को स्वीकार कर लिया था, किन्तु
नेपोलियन बोनापार्ट उसे पूरी तरह से आत्मसात् करना चाहता था। स्पेन ने समय-समय पर नेपोलियन बोनापार्ट की सहायता की थी और अपने जहाजी बेड़े को फ्रांस के लिए नष्ट कराया था, किन्तु पुर्तगाल की विजय के पश्चात् नेपोलियन बोनापार्ट स्पेन पर अपना अधिकार करने के लिए कटिबद्ध था। पुर्तगाल में जूनो को सहायता भेजने के बहाने उसने स्पेन में अपनी सेनाएँ भेजना प्रारम्भ किया। फाण्टेनब्ल्यू की सन्धि के अनुसार स्पेन ने उसे पुर्तगाल पर आक्रमण करने के लिए अपने राज्य से सेनाएँ गुजरने का अधिकार प्रदान कर दिया था, जिसका लाभ उठाकर नेपोलियन बोनापार्ट ने स्पेन में अपनी सेना एकत्रित करना प्रारम्भ कर दिया।
इस समय स्पेन में चार्ल्स चतुर्थ का शासन था और उसका पुत्र फर्डिनेण्ड 'उसका विरोधी था। नेपोलियन बोनापार्ट ने पिता व पुत्र, दोनों को दक्षिण फ्रांस में स्थित बेयोन (Bayonne) नामक स्थान पर आमन्त्रित किया और वहाँ दोनों को डराधमकाकर स्पेन की गद्दी से त्याग-पत्र लिखवा लिया। तत्पश्चात् उसने स्पेन की गद्दी पर अपने भाई जोजेफ को, जो नेपिल्स का भी राजा था, बैठा दिया। नेपिल्स " का राज्य नेपोलियन बोनापार्ट ने अपने बहनोई म्यूरा को सौंप दिया।

प्रायद्वीपीय युद्ध के कारण

नेपोलियन बोनापार्ट द्वारा स्पेन पर आक्रमण के निम्न कारण थे-
(1) नेपोलियन बोनापार्ट फ्रांस का औपनिवेशिक विस्तार करना चाहता था।
(2) स्पेन का शासक चार्ल्स चतुर्थ बूक़ वंश का था और नेपोलियन बोनापार्ट इस वंश को उखाड़ फेंकना चाहता था।
(3) चार्ल्स चतुर्थ की अकर्मण्यता एवं उसके मन्त्री गोदेय के विश्वासघात ने उसे स्पेन पर आक्रमण के लिए प्रोत्साहित किया था।
(4) चार्ल्स चतुर्थ के पुत्र फर्डिनेण्ड के विरोध के कारण राजपरिवार में एकता का अभाव था।
(5) कैथोलिक नेपोलियन बोनापार्ट के विरोधी थे और स्पेन उनका गढ़ था। अत: नेपोलियन बोनापार्ट ने इस गढ़ को नष्ट करने के उद्देश्य से स्पेन पर आक्रमण की योजना

महान भूल -

स्पेन पर आक्रमण नेपोलियन बोनापार्ट की महान् भूल थी, जिसे उसने स्वयं अपनी बन्दी अवस्था में स्वीकार किया था। स्पेन की जनता नेपोलियन बोनापार्ट के इस विश्वासपात और अत्याचार को सहन नहीं कर सकी। यद्यपि स्पेनिशों में अनेक मतान्तर थे, तथापि इस अत्याचार के कारण वे अपने मतान्तरों को भूलकर एक हो गए और नेपोलियन बोनापार्ट के विरुद्ध उठ खड़े हुए। सेना का पुनर्गठन किया गया। स्थान-स्थान पर जनता ने प्रबन्ध समितियों का गठन किया और कैथोलिक धर्म के मानने वालों ने पोप के शत्रु नेपोलियन बोनापार्ट के विनाश का उचित अवसर देखकर जन-साधारण को उत्तेजित व जाग्रत करना प्रारम्भ कर दिया। शीघ्र ही स्पेनिश सेना ने नेपोलियन बोनापार्ट की सेना के विरुद्ध युद्ध प्रारम्भ कर दिया।

प्रायद्वीपीय युद्ध का प्रारम्भ

क्षणिक सफलता के पश्चात् फ्रांस की सेना निरन्तर पराजित होने लगी। फ्रांस की सेना को जन-समुदाय की सहानुभूति के अभाव में तथा विपरीत परिस्थितियों में युद्ध करना पड़ रहा था। देश निर्धन था। आवागमन के साधन अत्यन्त खराब थे। पहाड़ियाँ, नदियाँ और कन्दराएँ मार्ग में रुकावट थीं। साथ ही स्पेन की सेना ने सामने के युद्ध की बजाय छापामार युद्ध प्रणाली का अवलम्बन किया और स्पेन की भौगोलिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर फ्रांस की सेना को विभिन्न स्थानों पर नुकसान पहुंचाया। प्रारम्भ में नेपोलियन बोनापार्ट इस संघर्ष से कुछ असन्तुष्ट था। वह इसे 'लुटेरों का युद्ध' कहता था। किन्तु बाद में उसने यह अनुभव किया कि वह राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत जनता का स्वतन्त्रता संग्राम था। मूरो के अस्वस्थ होकर फ्रांस वापस लौटने के कारण फ्रांस की सेना छिन्न-भिन्न हो गई, किन्तु फिर भी प्रायद्वीपीय युद्ध 1808 से 1813 ई. तक चलता रहा।
फ्रांस व स्पेन के मध्य लड़े गए प्रारम्भिक युद्धों में बेलेन (Baylen) का युद्ध (19 जुलाई,-1808) सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था। इसमें फ्रांसीसी सेनापति ड्यूपॉण्ट (Dupont) पराजित हुआ। नेपोलियन बोनापार्ट की सेना की स्थल पर यह प्रथम उल्लेखनीय पराजय थी। इस विजय ने स्पेनवासियों के हृदय में उत्साह और शक्ति का संचार कर दिया तथा सम्पूर्ण यूरोप में सनसनी फैला दी। लोगों के हृदय से फ्रांस की सेना की अजेयता का भ्रम सदैव के लिए टूट गया। 1 अगस्त को मैड्रिड के शासक जोजेफ को देश छोड़कर भागना पड़ा।

इंग्लैण्ड का सहयोग-

 फ्रांस के विरुद्ध इस संघर्ष में स्पेन को इंग्लैण्ड का जबरदस्त सहयोग व समर्थन प्राप्त हुआ। इंग्लैण्ड के विदेश मन्त्री कैनिंग ने नेपोलियन बोनापार्ट को पराजित करने के लिए चार योग्य सेनापति व 9,000 सैनिकों को पुर्तगाल भेजा। जिस दिन जोजेफ मैड्रिड छोड़कर भागा, उसी दिन ब्रिटिश सेनापति आर्थर वेलेजली अपनी सेना सहित पुर्तगाल के तट पर उतरा। उसने लिस्बन की ओर प्रस्थान किया और मार्ग में विमियरों (Vimiero) नामक स्थान पर जूनो के नेतृत्व वाली फ्रांसीसी सेना को पराजित किया। सिण्ट्रा के समझौते के अनुसार जूनो को पुर्तगाल खाली करना पड़ा और पुर्तगाल में ब्रिटिश सेना ने डेरा जमा लिया।

जार से समझौता-

नेपोलियन बोनापार्ट अपने सेनापति की इस पराजय से अत्यन्त क्रोधित हुआ। राष्ट्रीयता का बढ़ता हुआ जोश ऑस्ट्रिया को भी प्रभावित कर रहा था। अत: नेपोलियन बोनापार्ट ने स्थिति की गम्भीरता को समझते हुए जार अलेक्जेण्डर के साथ समझौता करने के लिए उससे एरफुर्ट नामक स्थान पर भेंट की और एक सन्धि करके दोनों ने आपसी मित्रता को दृढ़ कर लिया। तत्पश्चात् अपनी स्थिति को सुदृढ़ करके उसने स्पेन के विरुद्ध अभियान प्रारम्भ किया। बर्गोस (Burgos) के समीप 10 नवम्बर, 1808 को नेपोलियन बोनापार्ट ने स्पेन की सेना को पराजित किया और स्पेन की राजधानी मैड्रिड की ओर प्रस्थान किया। उसने एक बार पुन: मैड्रिड पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया और जोजेफ को पुनः गद्दी पर बिठाया।

ब्रिटिश सेनापति मूर का आगमन व मृत्यु -

आर्थर वेलेजली के पश्चात् ब्रिटिश सेनापति मूर को इस अभियान पर नियुक्त किया गया। नेपोलियन बोनापार्ट को ऑस्ट्रिया के विद्रोह के कारण वापस फ्रांस लौटना पड़ा। अतः उसने फ्रांस की सेना की बागडोर मार्शल सूल (Soult) के हाथों में दे दी। कॉरूना में मूर की सेना तो किसी प्रकार बचकर निकल गई, किन्तु वह स्वयं मारा गया, परन्तु उसका उद्देश्य पूर्ण हो चुका था। उसने नेपोलियन बोनापार्ट के दक्षिण की ओर विस्तार पर अंकुश लगा दिया।

वेलेजली की पुनः नियुक्ति -

इसी बीच आर्थर वेलेजली, जिसे कालान्तर में 'ड्यूक ऑफ वेलिंगटन' की उपाधि से विभूषित किया गया था, को पुनः स्पेन के अभियान पर भेजा गया। उसने पुर्तगाल से फ्रांस की सेना को भगाकर स्पेन में प्रवेश किया और तेलवारा के युद्ध में फ्रांसीसी सेना को पराजित किया। किन्तु मार्शल सूल की उपस्थिति के कारण वह आगे नहीं बढ़ सका।

मसेना की पराजय -

 ऑस्ट्रिया को पराजित करने के पश्चात् नेपोलियन बोनापार्ट ने पुनः अपना ध्यान स्पेन की ओर केन्द्रित किया। 1810 ई. के मध्य तक वहाँ फ्रांस की एक विशाल सेना (3,70,000) एकत्रित हो गई थी तथा नेपोलियन बोनापार्ट का सुयोग्य सेनापति मसेना भी वहाँ पहुँच चुका था। इसी बीच ड्यूक ऑफ वेलिंगटन ने एक के पीछे दूसरी तीन रक्षा पंक्तियाँ बनाकर अपनी सुरक्षा की समुचित व्यवस्था कर ली। उसने मसेना को बुसाको नामक स्थान के समीप पराजित किया, किन्तु उसे रक्षा पंक्तियों के पीछे शरण लेने के लिए बाध्य होना पड़ा। मसेना अत्यन्त प्रयास के बाद भी रक्षा पंक्तियों को नहीं तोड़ सका और वापस (मार्च, 1811) स्पेन लौटने के लिए बाध्य हुआ। नेपोलियन बोनापार्ट को मसेना की असफलता पर हार्दिक खेद हुआ और उसने उसके स्थान पर मामों को स्पेन के विरुद्ध सेनापति नियुक्त किया।

सेलेमेंका का युद्ध  -

इसी बीच ड्यूक ऑफ वेलिंगटन के पास इंग्लैण्ड से और सेना आ गई थी, परन्तु फ्रांस पर आक्रमण करने के बाद वह स्थिति में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं ला सका। 1812 ई. का वर्ष अंग्रेजों के लिए हितकर सिद्ध हुआ। नेपोलियन बोनापार्ट रूस के विरुद्ध युद्ध में संलग्न था, इसलिए उसने स्पेन के विरुद्ध युद्ध का सम्पूर्ण दायित्व अपने सेनापतियों पर छोड़ दिया, जिसका परिणाम यह हुआ कि ड्यूक ऑफ वेलिंगटन ने सेलेमेंका के युद्ध में फ्रांसीसी सेना को पराजित कर दिया और मैड्रिड में प्रवेश करके जोजेफ को एक बार पुनः राजधानी छोड़कर भागने के लिए विवश कर दिया। फ्रांस की सेना को दक्षिण स्पेन का प्रदेश खाली करना पड़ा। ड्यूक ऑफ वेलिंगटन अधिक समय तक मैड्रिड पर अपना नियन्त्रण स्थापित नहीं रख सका। नवम्बर में पुनः फ्रांस ने वहाँ अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया और ड्यूक ऑफ वेलिंगटन को वापस पुर्तगाल लौटना पड़ा। इस प्रकार यद्यपि उसकी विजय निरर्थक सिद्ध हुई, किन्तु फिर भी उसने दक्षिणी स्पेन को फ्रांस के आधिपत्य से मुक्त करा लिया।
1813 ई. में नेपोलियन बोनापार्ट ने सूल को अपने चुने हुए सैनिकों सहित वापस बुला लिया, जिससे स्पेन में उसकी शक्ति दुर्बल हो गई। ड्यूक ऑफ वेलिंगटन ने इस स्थिति का लाभ उठाकर एक बार पुन: मैड्रिड पर आक्रमण करके जोजेफ को मार भगाया। नेपोलियन बोनापार्ट ने तुरन्त सूल को स्पेन रवाना किया, किन्तु वह बदली हुई स्थिति में कोई प्रभाव स्थापित नहीं कर सका और पराजित हुआ। ड्यूक ऑफ वेलिंगटन ने तूलूस (Toulouse) पर 12 अप्रैल, 1814 को अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इस समय तक नेपोलियन बोनापार्ट ने लिपजिग की पराजय के पश्चात् मित्र राष्ट्रों के सम्मुख समर्पण कर दिया था। इस प्रकार निरन्तर पाँच वर्षों से चल रहे प्रायद्वीपीय युद्ध का अन्त हो गया।

सेलेमेंका के युद्ध के परिणाम

यह युद्ध नेपोलियन बोनापार्ट के लिए अत्यन्त घातक सिद्ध हुआ। इसमें असंख्य सैनिकों एवं योग्य सेनापतियों का बलिदान हुआ। स्पेन के युद्ध में व्यस्त होने के कारण वह शेष यूरोप की ओर ध्यान नहीं दे सका।. उसकी स्पेन की पराजय ने यूरोप के देशों के हृदय से उसकी अजेयता के भय को 'सदैव के लिए दूर कर दिया और कालान्तर में उसकी पराजय के मार्ग को प्रशस्त " किया। ग्राण्ट और टेम्परले ने इस सन्दर्भ में लिखा है, "स्पेन के युद्ध को कैंसर कहना अत्यन्त न्यायसंगत है, इसने नेपोलियन बोनापार्ट के शक्ति रस को चूस लिया था।"

प्रायद्वीपीय युद्ध में नेपोलियन बोनापार्ट की असफलता के कारण

प्रायद्वीपीय युद्ध में नेपोलियन बोनापार्ट की असफलता के निम्नलिखित कारण थे
(1) स्पेन की भौगोलिक परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि कोई बड़ी सेना वहाँ सफलता प्राप्त नहीं कर सकती थी। पहाड़ियाँ, नदियाँ तथा कन्दराएँ फ्रांस की सेना के लिए अभिशाप थीं। छापामार युद्ध प्रणाली के द्वारा स्पेन की सेना ने सदैव ही नेपोलियन बोनापार्ट की सेना को परेशान किया और उसे स्थायी विजय से वंचित रखा।
 (2) अभी तक नेपोलियन बोनापार्ट ने निरंकुश राजाओं से संघर्ष किया था, किन्तु इस बार संघर्ष राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत सैनिकों से था। इसलिए फ्रांस की सेना स्पेनवासियों के विरुद्ध संघर्ष में सफलता प्राप्त नहीं कर सकी।
(3) स्पेनवासियों द्वारा फ्रांस के विरुद्ध छापामार युद्ध प्रणाली को अपनाया गया। स्पेन के गुरिल्ला सैनिक आवागमन की व्यवस्था को भंग कर देते थे, रसद लूट लेते थे और फ्रांस की बड़ी सेना के किसी एक भाग पर आक्रमण करके पुनः पहाड़ों में छिप जाते थे। इसलिए सेना का एक बहुत बड़ा भाग इन विद्रोहियों को पकड़ने के लिए सुरक्षित रखना पड़ता था। स्पेन की दुर्गम भौगोलिक स्थिति के कारण फ्रांस की सेनाएँ सफलता प्राप्त करने से वंचित रहीं। हेजन ने भी लिखा है, "रक्षात्मक युद्ध के लिए देश की दशाएँ प्रशंसनीय थीं, किन्तु आक्रमणात्मक युद्ध करना अत्यन्त कठिन था।"
(4) मध्य यूरोप की समस्याओं में उलझा होने के कारण नेपोलियन बोनापार्ट स्पेन के अभियान की ओर पूर्ण ध्यान नहीं दे सका। 1810 ई. में उसने विपत्ति में फँसे मसेना की कोई सहायता नहीं की और 1812 ई. में सूल को स्पेन से वापस बुला लिया तथा 1813 ई. में जब स्पेन में उसका सर्वस्व लुट गया, तब उसने व्यर्थ ही निरीह प्राणियों का रक्तपात कराया।
(5) नेपोलियन बोनापार्ट के प्रबल शत्रु इंग्लैण्ड ने स्पेन को पूर्ण सहयोग प्रदान किया। स्पेन के इस अभियान के परिणामों को दृष्टिगत रखते हुए मैरियट ने लिखा है, "यूरोप को सिखाया गया कि फ्रांस अजेय नहीं था।"
(6) कैथोलिक पादरियों ने लोगों को नेपोलियन बोनापार्ट के विरुद्ध युद्ध के लिए उकसाया।
(7) नेपोलियन बोनापार्ट का भाई जोजेफ अकुशल सिद्ध हुआ। वह अपने सेनापतियों की स्वार्थप्रियता एवं अहंकार पर अंकुश नहीं लगा सका।
वस्तुतः स्पेन में नेपोलियन बोनापार्ट की पराजय ने केवल फ्रांस का ही विनाश नहीं किया, अपितु नेपोलियन बोनापार्ट के गौरव को भी प्रभावित किया। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए नेपोलियन बोनापार्ट को अनेक देशों से युद्ध करने पड़े, जिससे उसकी सैनिक शक्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ा। वह स्पेन को सैनिक शक्ति के बल पर कुचलना चाहता था, किन्तु राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत स्पेन की जनता के सम्मुख उसे स्वयं घुटने टेकने पड़े और बन्दीकरण के दौरान सेण्ट हेलेना में उसने यह स्वीकार किया कि "वास्तव में स्पेन के नासूर ने मेरा सर्वनाश किया।".
प्रायद्वीपीय युद्ध का महत्त्व प्रायद्वीपीय युद्ध का यूरोप के इतिहास में विशेष महत्त्व है। यह युद्ध नेपोलियन बोनापार्ट के पतन के प्रमुख कारणों में से एक था। यदि यह युद्ध न हुआ होता और नेपोलियन बोनापार्ट का पतन न हुआ होता, तो यूरोप का इतिहास ही कुछ और होता। इस प्रकार प्रायद्वीपीय युद्ध को यूरोप के इतिहास की एक निर्णायक घटना कहा जा सकता है।




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