मैकियावली अपने युग का शिशु - विवेचना

B. A.II-Political Science I

प्रश्न 7. मैकियावली को अपने युग का शिशु क्यों कहा जाता है ?

अथवा  "यह प्रतिभासम्पन्न फ्लोरेंसवासी वास्तविक अर्थ में अपने युग का शिशु था।" डनिंग के इस कथन की समीक्षा कीजिए।

अथवा  "मैकियावली अपने युग का शिशु था।" विवेचना कीजिए।

उत्तर - डनिंग ने अपनी रचना A History of Political Theories :: Ancient & Medieval' में मैकियावली को अपने युग का शिशु बतलाया है।

"साधारणतया प्रत्येक दार्शनिक और राजनीतिज्ञ के दर्शन और नीतियों पर उसके देश काल की पारस्थतियों का प्रभाव पड़ता है। परन्त मैकियावली पर अपने समकालीन राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं नैतिक वातावरण की छाप सबसे सुस्पष्ट रूप से अंकित है। इसलिए डनिंग ने विशेष रूप से उसे अपने युग का शिशु कहा है। मैकियावली ही अपने युग का ऐसा व्यक्ति, दार्शनिक और पर्यवेक्षक है जिसने समकालीन परिस्थितियों को सही और यथार्थ रूप में देखा तथा इटेलियन समाज का बारीकी से अध्ययन किया। 

मैकियावली अपने युग का शिशु

मैकियावली इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि बौद्धिक और मानसिक दृष्टि से अधिक सम्पन्न होते हुए भी इटैलियन समाज के पिछड़ेपन का कारण धार्मिक अन्धविश्वास है। इसलिए उसने धार्मिक साम्राज्य का विरोध किया और बताया कि स्वतन्त्र इटैलियन राष्ट्र बनने से ही इटली की स्थिरता व सुरक्षा सम्भव है। अपनी रचनाओं 'The Prince', 'The Discourses' तथा 'The Art of war' में मैकियावली ने समकालीन पारास्थातयों, समस्याओं आदि पर प्रकाश डाला है तथा उसके समाधान प्रस्तत किए हैं। इस सम्बन्ध में सेबाइन ने लिखा है, "उसके (मैकियावली के) युग का कोई भी अन्य व्यक्ति यरोप के राजनीतिक विकास की दिशा को इतनी स्पष्टता के साथ नहीं देख सका जितनी स्पष्टता के साथ इसे मैकियावली ने देखा था " कोई भी अन्य इटली को उतने अच्छे रूप में नहीं जानता था, जितना कि मैकियावली।"

अत: मैकियावली पर जिन सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ा और जिस प्रभाव के कारण वह अपने युग का शिशु कहलाता है, निम्न प्रकार हैं

(1) इटली का राजनीतिक विभाजन तथा पतन -

मैकियावली के जीवनकाल में राष्ट्रीय संगठन पूर्णतया नष्ट हो चुका था और वह अनेक स्वतन्त्र नगर राज्यों और छोटे-छोटे खण्डों में बँट गया था। इन राज्यों में पाँच विशेष रूप से शक्तिशाली थे। ये थे-नेपिल्स का राज्य, मिलान का राज्य, रोमन चर्च का क्षेत्र, वेनिस गणराज्य तथा फ्लोरेंस गणराज्य। ये पाँचों राज्य भी आपस में टकराव की स्थिति में थे। यही नहीं, नैतिक दृष्टि से भी इटली का इतना पतन हो चुका था कि वहाँ के लोग किराये के सैनिक के रूप में लड़ने जाते थे, जो अधिक धन के लालच में किसी भी तरफ बिक जाते थे। 

सच्चाई और ईमानदारी कहीं नहीं थी। चर्च और साम्राज्य, दोनों का प्रभाव समाप्त हो चुका था। स्वयं पोप का चरित्र अपवित्रता की सीमा लाँघ रहा था। अत: मैकियावली चाहता था कि इटली को भी ऐसा शासक मिले जो पाँचों राज्यों को एकता के सूत्र में बाँधकर सदढ राजतन्त्र की स्थापना कर सके। इटली को फ्रांस और स्पेन से सुरक्षित रख सके जो इटली को हड़पने के लिए तैयार बैठे हैं। इसी उद्देश्य को लेकर मैकियावली ने अपने ग्रन्थों 'The Prince', 'The Discourses' तथा 'The Art of War' की रचना की।

(2) राजतन्त्र की पुनर्स्थापना-

मैकियावली अपने समय में पश्चिमी यूरोप में स्थापित राजतन्त्र की सफलता को देख रहा था कि किस तरह स्पेन, फ्रांस और इंग्लैण्ड में राजतन्त्र के नेतृत्व में राष्ट्र में एकीकरण और विकास हो रहा है। वास्तव में यह युग सबल राजतन्त्र का युग था। इसी कारण मैकियावली ने भी इटली के लिए एक ऐसे शासन की कल्पना की थी जिसमें इटली को समस्त राजनीतिक शक्ति का केन्द्रीकरण हो तथा जो इटली में एकता स्थापित कर शक्तिशाली राजतन्त्र की स्थापना कर सके। मैकियावली ने अपने गन्थों 'The Prince' तथा 'The Discourses' में इसी विचार को निरन्तर अभिव्यक्ति प्रदान की है।

(3) पुनर्जागरण-

मैकियावली के समय में समस्त यूरोप बौद्धिक पुनर्जागरण के दौर से गुजर रहा था, जिसने मैकियावली के विचारों को भी प्रभावित किया। पुनर्जागरण सम्बन्धी यह धारणा मैकियावली में घर कर गई थी कि 'मानव स्वयं ही अपने जीवन का निर्माता है, यह विश्व विकासशील है और इसमें उन्हीं का अस्तित्व रहता है, जो अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हैं।' इटली में यह पुनर्जागरण 16वीं शताब्दी में अपनी चरम सीमा पर था, इसलिए कभी-कभी इसे इटैलियन पुनरुत्थान भी कह दिया जाता है। इस पुनर्जागरण आन्दोलन से मध्य काल की पारलौकिकता समाप्त होने लगी। 

पुनर्जागरण ने चर्च और धर्म की जड़ों पर कड़े प्रहार किए और आन्दोलन ने मनुष्य के स्वतन्त्र बौद्धिक विकास को प्रोत्साहित किया।  मैकियावली ने चर्च और धर्म की जड़ों पर कड़े प्रहार किए, जिन्होंने तत्कालीन समाज को दूषित कर रखा था। मैकियावली ने लिखा है, "हम इटैलियन रोम के चर्च और उसके पुजारियों के कारण ही अधार्मिक और बुरे हो गए हैं। चर्च के हम एक और बात के ऋणी हैं और यही बात हमारे लिए विध्वंस का कारण है कि चर्च ने हमारे देश को विभाजित कर रखा है और वह अब भी ऐसा कर रहा है।" उल्लेखनीय है कि मैकियावली ने धार्मिक पाखण्डों के विरुद्ध जेहाद छेड़ा था।

मैकियावली यद्यपि गणतन्त्र का समर्थक था, परन्तु इटली की विशेष परिस्थितियों के कारण ही उसने निरंकुश राजतन्त्र का समर्थन किया। मैकियावली का कहना था कि निरंकुश राजा ही इटली की शोचनीय अवस्था को सुधार सकता है। यद्यपि मैकियावली ने अपने विचार अपने देश की दशा को सुधारने के उद्देश्य  से प्रकट किए थे, परन्तु उसकी विचारधारा ने बाद में समस्त विश्व को प्रभावित किया।

(4) राष्ट्रीयता की भावना-

मैकियावली के समय में विश्व के सभी देश राष्ट्रीय राज्य को अपनाए जा रहे थे और उसके पीछे निरंकुश शासक का महत्त्वपूर्ण हाथ था। मैकियावली ने पाया कि इंग्लैण्ड, स्पेन और फ्रांस के सुसंगठन एवं सम्पन्नता के पीछे भी राष्ट्रीयता की भावना की प्रबलता ही है। इनसे प्रभावित होकर मैकियावली इटली को एक राष्ट्र के रूप में देखना चाहता था। वह अपने इस कार्य के लिए पाँचों राज्यों (नेपिल्स, मिलान, वेनिस, फ्लोरेंस तथा पोप के प्रदेश) को मिलाकर इटली का एकीकरण करना चाहता था। स्पष्ट है कि राष्ट्रीयता से प्रभावित होकर ही मैकियावली निरंकुश राजतन्त्र का समर्थन करता

(5) व्यवहारवाद और व्यक्तिवाद का समर्थन-

इस युग की एक अन्य विशेषता व्यावहारिकता पर बल देना था और मैकियावली ने भी व्यावहारिक राजनीति पर बल दिया। उसके अनुसार राजा की नैतिकता व्यक्ति की नैतिकता से बिल्कुल भिन्न है। मैकियावली ने स्पष्ट कहा कि यदि साध्य अच्छा हो, तो राजा को साधनों की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। इस प्रकार मैकियावली 'राजनीति' और 'नीतिशास्त्र' को एक-दूसरे से पृथक् करता है। इसके अतिरिक्त उसने मनुष्य को स्वयं अपने भाग्य का निर्माता बताया व अपने समय के विचारकों की तरह व्यक्तिवाद का भी समर्थन किया।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मैकियावली पर तत्कालीन परिस्थितियों व घटनाओं का व्यापक प्रभाव पड़ा था और वह इन परिस्थितियों का अध्ययन करते हुए उनका निदान सुझाता है। अतः हम कह सकते हैं कि डनिंग का यह कथन पूर्णतया सत्य है कि "यह प्रतिभाशाली फ्लोरेंसवासी वास्तविक अर्थ में अपने युग का शिशु था।"

 

 

 


Comments

  1. Thanxx for the content😍❤❤

    ReplyDelete
  2. very's help fully answore

    ReplyDelete
  3. Thank you helpfull answer

    ReplyDelete
  4. 🙏🏻🙏🏻धन्यवाद आदरणीय श्री मान जी आप हमेशा इसी तरह खुश रहे और ईश्वर आप के उपर सदैव अपनी अनुकम्पा बनाए रखें
    आप का स्नेह भरा ज्ञान बहुत ही लाभदायक है

    ReplyDelete
  5. सधन्यवाद गुरूजी

    ReplyDelete
  6. Thanks for your help

    ReplyDelete

Post a Comment

Important Question

कौटिल्य का सप्तांग सिद्धान्त

नौकरशाही का अर्थ,परिभाषा ,गुण,दोष

सरकारी एवं अर्द्ध सरकारी पत्र में अन्तर

गिल्लू पाठ का सारांश- महादेवी वर्मा

मार्टन कैप्लन का अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था का सिद्धान्त

दिल्ली सल्तनत - पतन के 14 कारण

एम. एन. राय का नव-मानवतावाद सिद्धान्त

सूत्र और स्टाफ अभिकरण में क्या अंतर है ?

प्रयोजनमूलक हिंदी - अर्थ,स्वरूप, उद्देश्य एवं महत्व