स्पेन का पतन - कारण तथा विवेचना
M.J. P.R.U., B.A. I, History II / 2021
प्रश्न 7. स्पेन के अधःपतन के कारण बताइए।
प्रश्न 7. स्पेन के अधःपतन के कारण बताइए।
अथवा '' स्पेन के पतन के
कारणों की विवेचना कीजिए।
(1) स्पेनी साम्राज्य का दुर्बल ढाँचा -
स्पेन के अध:पतन का सर्वप्रमुख कारण स्पेनी
साम्राज्य की अन्तर्भूत दुर्बलताएँ थीं। स्पेनी साम्राज्य की कोई आधारभूत नींव न
थी। साम्राज्य का स्वरूप राष्ट्रीय नहीं वरन् राजवंशीय था संस्कृति, ऐतिहासिक विरासत, भाषा, धर्म, शासन पद्धति, रीति-रिवाज, जातीयता, सभी दृष्टियों से स्पेनी साम्राज्य के अन्तर्गत
प्रदेशों में कोई सामान्य सादृश्य न था स्पेनी साम्राज्य में राष्ट्रीय एकता,
प्रशासकीय संगठन तथा बुनियादी आधार का अभाव था।
स्पेनी साम्राज्य के अत्यन्त विशाल व विस्तृत होने के परिणामस्वरूप साम्राज्य के
किसी-न-किसी प्रदेश में समस्याएँ उत्पन्न होती रहती थीं। धर्म सुधार आन्दोलन,
फ्रांस-स्पेन युद्ध, तुर्कों की आक्रामक नीति, इंग्लैण्ड की स्पेन विरोधी नीति तथा नीदरलैण्ड्स का विद्रोह
इसी प्रकार की समस्याएँ थीं। इन समस्याओं ने स्पेनी साम्राज्य के ढाँचे को हिलाकर
रख दिया था।
(2) फिलिप द्वितीय के अयोग्य उत्तराधिकारी -
फिलिप द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् स्पेनी
साम्राज्य की राजनीतिक अवनति होने लगी। उसके उत्तराधिकारी अयोग्य सिद्ध हुए। इन
अयोग्य उत्तराधिकारियों के काल में शासन की बागडो उनके अयोग्य तथा स्वार्थी
मन्त्रियों के हाथों में चली गई। अत: राष्ट्रीय व साम्राज्य के हितों की उपेक्षा
की जाने लगी। फिलिप द्वितीय का पुत्र फिलिप तृतीय (1598 से 1621 ई. तक) अत्यन्त
अयोग्य व कमजोर शासक था। वह अपने चापलूस के हाथों की कठपुतली बना रहा। उसके
शासनकाल में राजस्व का दुरुपयोग किया गया तथा सरकारी ठेकेदारों ने शोषण नीति
द्वारा देश को आर्थिक विफलता के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। फिलिप चतुर्थ के
शासनकाल (1621 से 1665 ई. तक) में स्पेन तीस वर्षीय युद्ध में फँस
गया। इससे राज्य की आर्थिक समस्याएँ विकट हो गईं तथा अर्थव्यवस्था में स्फीति (Inflation)
बढ़ने लगी तीस वर्षीय युद्ध व पुर्तगाल तथा
डचों के स्वतन्त्रता युद्धों के परिणामस्वरूप स्पेन का दिवाला निकल गया। संक्षेप में फिलिप तृतीय व
फिलिप चतुर्थ का शासनकाल स्पेनी गौरव का सूर्यास्त काल सिद्ध हुआ। स्पेन का अन्तिम
हैप्सबर्ग शासक चार्ल्स द्वितीय (1665 से 1700 ई. तक) अल्प
बुद्धि वाला, दुर्बल व अयोग्य
प्रशासक था। उसके काल में पतनोन्मुख स्पेनी साम्राज्य की अन्त्येष्टि क्रिया
सम्पन्न हुई। संक्षेप में चार्ल्स द्वितीय का शासनकाल 'राजवंशीय अराजकता' का काल था। इस प्रकार फिलिप द्वितीय के पश्चात् स्पेन को कोई योग्य
उत्तराधिकारी प्राप्त न हुआ।
(3) स्पेन की कमजोर आर्थिक स्थिति -
स्पेन के अध:पतन का वास्तविक कारण आर्थिक था। दीर्घकालीन
एवं खर्चीले वैदेशिक युद्धों के कारण स्पेन की आर्थिक स्थिति जर्जर हो गई, फलस्वरूप स्पेन का पतन होने लगा। सम्राट्
चार्ल्स पंचम व फिलिप द्वितीय ने यूरोपीय राजनीति में स्पेनी प्रभुत्व की स्थापना
हेतु जो अनवरत् प्रयास किए, उनके
परिणामस्वरूप राज्य के समस्त आर्थिक साधन नष्ट हो गए तथा राष्ट्रीय ऋण व करों में
तीव्र वृद्धि हो गई। स्पेनी राजकोष का अत्यधिक दुरुपयोग व अपव्यय होता था। राजवंश
व दरबार के सदस्यगण शान-शौकत व भोग-विलास के लिए राष्ट्रीय धन का अत्यधिक अपव्यय
करते फिलिप द्वितीय की धार्मिक कट्टरता व असहिष्णुता की नीति के परिणामस्वरूप
हजारों व्यापार कुशल यहूदियों व उद्योग प्रधान मूरों को स्पेन छोड़ना पड़ा,
जिससे स्पेन की आर्थिक शक्ति को गहरा धक्का
पहुँचा। स्पेन के समतों व उच्चवर्गीय लोगों की व्यापार-वाणिज्य तथा उद्योग-धन्धों
में कोई रुचि नहीं थी। वस्तुत: व्यापार या उद्योग को वे अपनी प्रतिष्ठा के विरुद्ध
समझते थे। सेन में प्रचलित उत्तराधिकार का नियम अत्यन्त विचित्र था, जिसके अनुसार पैतृक सम्पत्ति का अधिकारी उसका
ज्येष्ठ पुत्र ही होता था। अन्य पुत्रों के लिए सेना व चर्च के पद होते थे। अन्य
प्रकार का पेशा उनके लिए निषिद्ध था। यह व्यवस्था स्पेनी व्यापार व वाणिज्य की
दृष्टि के लिए बड़ी घातक थी। स्पेन की व्यापारिक नीति भी बड़ी त्रुटिपूर्ण थी। सभी
वस्तुओं पर 10% की दर से विक्रय
कर लगाया जाता था। इससे राष्ट्रीय व्यापार व उद्योगों को बड़ी क्षति पहुँची। राज्य
के उद्योगों को राजकीय संरक्षण प्राप्त न था। वस्तुतः बाह्य दृष्टि से स्पेनी
साम्राज्य अत्यन्त सम्पन्न प्रतीत होता था, परन्तु वास्तव में आन्तरिक दृष्टि से वह खोखला
(4) कृषि की दयनीय दशा स्पेनी व्यापार-वाणिज्य तथा उद्योग -
धन्धों की मोति ही कृषि की दशा भी बड़ी दयनीय
थी। स्पेन के शासकों ने कृषि की उन्नति के लिए कोई सुधार या प्रयत्न नहीं किया। भूमि
के अधिकांश भाग पर सामन्तों तथा चर्च का अधिकार था, परन्तु कृषि की उन्नति के प्रति वे बड़े उदासीन थे। भेड़
पालन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से कृषकों को खेतों की घेराबन्दी करनी
निषिद्ध कर दी गई। इसके कारण तैयार फसल नष्ट हो जाती थी।
(5) स्पेनी शासकों की धार्मिक असहिष्णुता की नीति -
स्पेन के शासक कैथोलिक थे। उन्होंने कैथोलिक
धर्म को यूरोप का सार्वभौम धर्म बनाने की चेष्टा की। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने
कैथोलिक विरोधियों का क्रूरतापूर्वक दमन किया। स्पेनी शासकों की धार्मिक
असहिष्णुता तथा 'इन्क्वीजिशन'
नामक धार्मिक अदालतों के निर्दयतापूर्ण कार्यों
ने स्वतन्त्र चिन्तन व विज्ञान के स्वतः विकास के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया।
परिणामस्वरूप सांस्कृतिक व वैधानिक विकास के क क्षेत्र में स्पेन काफी पिछड़ गया
एक को राजा का
(6) जनसंख्या में कमी -
16वीं शताब्दी के प्रथम चरण में स्पेन की जनसंख्या तेजी से
घटने लगी। निःसन्देह स्पेन के लोगों का उपनिवेशों में प्रवास, दीर्घकालीन युद्धों में भयंकर जन-हानि तथा
बहुसंख्यक यहूदियों व मूरों के निष्कासन के परिणामस्वरूप स्पेन की जनसंख्या काफी
कम हो गई। इसके अतिरिक्त डचों तथा पुर्तगाल के स्वतन्त्रता युद्धों व असहिष्णु
धार्मिक नीति के परिणामस्वरूप भी स्पेनी साम्राज्य की जनसंख्या में कमी आई।
(7) सुदृढ़ नौसेना का अभाव -
स्पेन की स्थल सेना अत्यन्त सुदृढ़ थी किन्तु भूमध्य सागर
और अटलाण्टिक सागर में अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए स्पेन के लिए यह अत्यन्त
आवश्यक था कि वह अपनी नौसेना को भी सुदृढ़ करता । स्पेन के शासकों ने कभी भी
गम्भीरता से नौसेना के विकास के विषय में विचार नहीं किया। फिलिप चतुर्थ ने एक बार
इंग्लैण्ड से लोहा लेने के लिए शक्तिशाली नौसेना 'आर्मेडा' का गठन किया था,
किन्तु आर्मेडा की पराजय ने स्पेनी नौसेना की
शक्ति पर प्रश्न-चिह्न लगा दिया। इसके विपरीत स्पेन के प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी
फ्रांस व इंग्लैण्ड की नौसेना दिन-प्रतिदिन सुदृढ़ होती चली गई। परिणामस्वरूप
स्पेन की सामुद्रिक प्रभुता समाप्त हो गई।
(8) अन्य कारण -
यूरोपीय राजनीति में फ्रांस का उत्कर्ष व प्राधान्य, लु चतुर्दश की साम्राज्य विस्तार नीति, इंग्लैण्ड तथा फ्रांस की उपनिवेशवादी नीति इंग्लैण्ड
तथा हॉलैण्ड का नौसेना के क्षेत्र में उत्थान आदि भी स्पेन के अध:पत के अन्य
महत्त्वपूर्ण कारण थे।
संक्षेप में, स्पेनी साम्राज्य
की विशालता एवं स्पेनी शासकों की अकुशल नीतियों ने स्पेनी साम्राज्य में अनेक
अन्तर्विरोध उत्पन्न कर दिए। इन अन्तर्विरोध का सीधा प्रभाव वहाँ की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं संस्कृतिक
स्थिति पर पड़ा। यह प्रभाव नकारात्मक सिद्ध हुआ, जिसका पूर्ण लाभ सेन के
प्रतिद्वन्द्वियों— फ्रांस, इंग्लैण्ड तथा हॉलैण्ड ने
उठाया।
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