हरबर्ट स्पेन्सर का सावयव सिद्धान्त - आलोचनात्मक

B.A. I, Political Science I 

प्रश्न 5. हरबर्ट स्पेन्सर द्वारा प्रतिपादित राज्य के सावयव या शरीर सिद्धान्त का विश्लेषण करते हुए उसकी सीमाएँ बताइए।

अथवा "राज्य एक शरीर है।" इस कथन की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।

अथवा '' राज्य की उत्पत्ति के सावयव सिद्धान्त का आलोचनात्मक वर्णन कीजिए तथा उसका महत्त्व बताइए।

अथवा "राज्य के सावयव सिद्धान्त का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति तथा राज्य के एकीकरण द्वारा उसके विरोध को मिटाने का प्रयत्न करना है।" (लीकॉक) उपर्युक्त कथन की व्याख्या कीजिए।


उत्तर - सावयव सिद्धान्त के अन्तर्गत राज्य को एक शरीर के रूप में माना जाता है। इसके अनुसार जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग होते हैं और उन अंगों से मिलकर शरीर बनता है, उसी प्रकार राज्य के विभिन्न अवयव होते हैं और उन अवयवों से मिलकर राज्य का निर्माण होता है । जिस प्रकार शरीर अंगों का समूह मात्र नहीं होता है और उसका उन अंगों से पृथक् भी अस्तित्व होता है

उसी प्रकार यद्यपि राज्य का निर्माण व्यक्तियों से मिलकर होता है, किन्तु इन व्यक्तियों से पृथक् भी 'राज्य का अपना एक अलग अस्तित्व होता है। जिस प्रकार शरीर से अलग हो जाने पर अंगों का कोई अस्तित्व नहीं है ,ठीक उसी प्रकार राज्य से अलग व्यक्तियों का कोई अस्तित्व नहीं है। प्राणी के शरीर के समान ही राज्य का विकास भी माना गया है। इस प्रकार सावयव सिद्धान्त राज्य को केवल कल्पना ही नहीं मानता, वरन् वह उसे वास्तविक शरीर की श्रेणी में रखता है। जिस प्रकार जीवधारी अपने अंगों पर निर्भर होता है.राज्य और व्यक्ति में भी उसी प्रकार की आत्मनिर्भरता का सम्बन्ध है । 

गार्नर के शब्दों में, “सावयव सिद्धान्त एक प्राणी वैज्ञानिक धारणा है,जो राज्य को जीवधारी व्यक्ति मानता है , उसकी रचना करने वाले व्यक्तियों को जीवधारी शरीर के कोष्ठों के समान समझता है और राज्य तथा व्यक्ति के बीच ठीक उसी प्रकार के अन्योन्याश्रित सम्बन्ध की कल्पना करता है, जैसा सम्बन्ध शरीर और उसके अंगों के बीच होता है।"

हरबर्ट स्पेन्सर और सावयव सिद्धान्त

इंग्लैण्ड के विचारक हरबर्ट स्पेन्सर ने राज्य की उत्पत्ति के सावयव सिद्धान्त की विस्तृत व्याख्या की है। स्पेन्सर ने अपनी पुस्तक 'Principles of Sociology' में राज्य और शरीर के मध्य सूक्ष्म रूपक बाँधा है। उनके अनुसार राज्य या समाज एक प्राकृतिक जीवित शरीर है, जो अन्य जीवधारियों से किसी प्रकार अलग नहीं है। उन्होंने राज्य और शरीर की रचना तथा विकास का वैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए अनेक समानताएँ तथा असमानताएँ बताई हैं।
हरबर्ट स्पेन्सर का सावयव सिद्धान्त
हरबर्ट स्पेन्सर

राज्य तथा प्राणी के शरीर में समानताएँ

स्पेन्सर ने राज्य तथा शरीर में निम्नलिखित समानताओं का प्रतिपादन किया है

(1) विकास  - 

राज्य और प्राणी शरीर का जन्म तथा विकास एक ही प्रकार से होता है। प्रारम्भ में शरीर में कोशिकाओं का विकास होता है, अंग-प्रत्यंग विकसित होते हैं, फिर शरीर पूर्ण विकास को प्राप्त होता है। इसी प्रकार राज्य का प्रारम्भ व्यक्ति और परिवार से हुआ और शनै-शनैः उसका विकास होता गया। आज राज्य अपने विकसित एवं विशाल रूप में मिलते हैं।

(2) संरचना -

राज्य और प्राणी शरीर, दोनों की संरचना एक समान है। जिस प्रकार शरीर कोशिकाओं,ऊतकों, हड्डी, मांस एवं मज्जा आदि से बना है, उसी प्रकार राज्य भी व्यक्ति, समूह, सरकार एवं अनेक संगठनों से मिलकर बना है। अनेक अंग व घटक होते हुए भी शरीर और राज्य का पृथक् अस्तित्व बरकरार रहता है।

(3) जन्म -

प्राणी शरीर तथा राज्य, दोनों का जन्म भी जीवाणुओं के रूप में प्रारम्भ होता है।

(4) राज्य का संगठन  

शरीर तथा राज्य का संगठन भी एक समान है। शरीर के तीन भाग-जीवन प्रणाली, विभाजन प्रणाली तथा विनिमय प्रणाली माने गए हैं। इन तीनों प्रणालियों पर मस्तिष्क अपना पूर्ण नियन्त्रण रखता है। शरीर का प्रमुख अंग भी यही है। राज्य का संगठन भी इसी प्रकार का है। राज्य में भी जीवन प्रणाली के अनुसार उत्पादन क्रिया, विभाजन प्रणाली के अनुसार यातायात व सन्देशवाहन के साधन तथा मस्तिष्क के समान सरकार का स्वरूप होता है । हृदय से रक्त बाहर ले जाने वाली और बाहर से हृदय को रक्त पहुँचाने वाली नाड़ियों तथा रेल के ऊपर व नीचे की ओर से जाने वाली तार की लाइनों में समानता पाई जाती है।

(5) परस्पर निर्भरता - 

जीवधारी शरीर तथा राज्य,दोनों में ही पारस्परिक निर्भरता पाई जाती है। जिस प्रकार एक अंग के निर्बल तथा बीमार हो जाने का प्रभाव सम्पूर्ण शरीर पर पड़ता है, उसी प्रकार राज्य का स्वास्थ्य और बल तथा उसकी समृद्धि भी राज्य के व्यक्तियों तथा वर्गों पर निर्भर करती है। उनके कार्यों की एक-दूसरे पर प्रतिक्रिया होती है । जब शरीर के अंग ठीक प्रकार से काम नहीं करते हैं,तो शरीर को हानि पहुँचती है । ठीक उसी प्रकार यदि समाज में लुहार,बढ़ई,किसान,व्यापारी आदि अपने-अपने कार्यों को ठीक प्रकार से सम्पन्न करना छोड़ दें, तो इससे सम्पूर्ण समाज को हानि पहुँचेगी।

(6) विनाश का क्रम - 

जिस प्रकार शरीर नश्वर है और उसका निरन्तर विनाश होता रहता है, उसी प्रकार राज्य में भी अनेक संस्थाएँ नष्ट होती रहती हैं । जो व्यक्ति बीमार पड़ जाते हैं, वे विनाश की ओर बढ़ जाते हैं तथा एक दिन मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं और इनके स्थान पर नये व्यक्ति जन्म लेते हैं। उसी प्रकार राज्य में भी एक संस्था के नष्ट हो जाने पर दूसरी संस्था का गठन हो जाता है। इस प्रकार स्पेन्सर ने राज्य तथा शरीर के मध्य समानता स्थापित की है।

राज्य और सावयव में विभिन्नताएँ

स्पेन्सर ने अनेक समानताएँ दिखाकर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि राज्य एक शरीर है, तथापि उसने राज्य और सावयव में कुछ विभिन्नताओं की कल्पना की है, जिनमें से मुख्य निम्न प्रकार हैं

 (1) आकार की दृष्टि से - 

राज्य का कोई आकार और निश्चित शरीर नहीं होता, जबकि प्राणी का एक निश्चित शरीर होता है, जिसे देखा और अनुभव किया जा

(2) सम्बद्धता की दृष्टि से - 

प्राणी के शरीर के अंग एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं तथा एक दूसरे से सम्बद्ध रहते हैं। शरीर के एक अंग के शरीर से अलग होने पर उसका मूल्य नहीं रहता, जबकि राज्य के अंग पृथक् होते हुए भी चेतनायुक्त होते हैं।

(3) परिवर्तन की दृष्टि से - 

प्राणी के अंग स्थिर होते हैं, वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं पहुँच सकते और न आपस में अपना स्थान बदल सकते हैं। परन्तु राज्य के घटक एक स्थान से हटकर दूसरे स्थान पर जाने के लिए स्वतन्त्र होते हैं । वे स्थान परिवर्तन भी कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, नाक का काम कान नहीं कर सकता, परन्तु एक चपरासी क्लर्क बन सकता है।

सावयव सिद्धान्त की आलोचना अथवा सीमाएँ

राज्य की उत्पत्ति के सावयव सिद्धान्त की निम्न आधारों पर आलोचना की जाती है---

(1) समानता पूर्ण नहीं - 

शरीर और राज्य की सावयवी समानता पूर्ण नहीं है। दोनों में कई बातों में अन्तर है। शरीर के घटकों का कोई पृथक् व्यक्तित्व, इच्छा व चेतना नहीं होती, वे पदार्थ के अंश मात्र होते हैं। किन्तु व्यक्ति का एक पृथक् अस्तित्व, इच्छा एवं चेतना शक्ति होती है । यह ठीक है कि व्यक्ति समाज तथा राज्य के बिना अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं कर सकता, किन्तु वह उसके बिना जीवित अवश्य रह सकता है। 
इस सम्बन्ध में बार्कर ने कहा है कि राज्य एक जीवधारी नहीं है, वरन् वह एक जीवधारी के समान है। वह जीवधारी नहीं है,क्योंकि उसकी बनावट शारीरिक नहीं है । वह एक मानसिक बनावट है। सामान्य उद्देश्य के लिए वह विभिन्न विभागों का संगठन है।"

(2) विकासवाद के सिद्धान्त में अन्तर - 

राज्य या समाज के जन्म तथा विकास के सिद्धान्त व्यक्ति के शरीर के जन्म तथा विकास के सिद्धान्त से भिन्न हैं, क्योंकि व्यक्ति का जन्म पुरुष तथा स्त्री के संयोग से होता है,जबकि राज्य का जन्म इस प्रकार नहीं होता है। प्राणी का शरीर स्वयं विकसित होता और बढ़ता है, जबकि राज्य की उन्नति व्यक्तियों के सहयोग से होती है।

(3) व्यक्ति का स्थान पूर्व निर्धारित नहीं होता  - 

शरीर के अन्तर्गत विभिन्न अंगों का स्थान पूर्व निर्धारित होता है तथा इन अंगों के कार्य प्राकृतिक शक्तियों के द्वारा निश्चित किए जाते हैं। किन्तु समाज में व्यक्ति का स्थान पूर्व निर्धारित नहीं होता, व्यक्ति समाज में अपना स्थान स्वयं बनाता है।

(4) राज्य के कार्यक्षेत्र की सन्तोषजनक व्याख्या नहीं  - 

 सावयव सिद्धान्त राज्य को क्या करना चाहिए' इस प्रश्न का समाधान नहीं करता। गैटेल ने ठीक ही कहा है, "सावयव सिद्धान्त राज्य की प्रकृति की कोई सन्तोषजनक व्याख्या नहीं है और न ही हमारा कुछ पथ-प्रदर्शन कर सकती है।"

(5) सावयव सिद्धान्त के भयंकर परिणाम हो सकते हैं  - 

सावयव सिद्धान्त को स्वीकार करने से व्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिए बहुत अधिक भयंकर परिणाम हो सकते हैं । यदि राज्य को मानव शरीर माना जाए, तो शरीर के अंगों के समान व्यक्ति साधन मात्र रह जाएगा। इस सिद्धान्त को स्वीकार करने के परिणामस्वरूप व्यक्ति का व्यक्तित्व राज्य के व्यक्तित्व में समाहित हो जाएगा तथा उसकी स्वतन्त्र सत्ता व अधिकार समाप्त हो जाएँगे।

(6) स्पेन्सर द्वारा सिद्धान्त का त्रुटिपूर्ण प्रयोग -

सावयव सिद्धान्त का प्रयोग प्रमुख रूप से हरबर्ट स्पेन्सर ने किया है और उन्होंने इस सिद्धान्त के आधार पर ऐसे निष्कर्ष निकाले हैं जिनका सावयव सिद्धान्त से कोई मेल नहीं है । स्पेन्सर ने सावयव सिद्धान्त के आधार पर व्यक्तिवाद का समर्थन किया है, किन्तु जैसा कि बार्कर ने कहा है कि प्राणी विज्ञान तथा व्यक्तिवाद दो ऐसे अनमोल घोड़े सिद्ध हुए हैं जो प्राणी को। दो विरोधी दिशाओं में खींचते हैं।

सावयव सिद्धान्त का महत्त्व

उपर्युक्त आलोचनाओं के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि सावयव सिद्धान्त का कोई मूल्य या महत्त्व नहीं है । वास्तव में राज्य के स्वरूप तथा व्यक्ति और राज्य के आपसी सम्बन्ध को समझाने के लिए यह सिद्धान्त अत्यन्त उपयोगी है।
गैटेल ने इस सिद्धान्त की उपयोगिता को निम्न प्रकार स्पष्ट किया है

(1) यह सिद्धान्त राज्य के ऐतिहासिक विकास के महत्त्व को बतलाता है । इसके अनुसार राज्य को एक कृत्रिम वस्तु नहीं माना जा सकता, वरन् उसका विकास हुआ

(2) यह राज्य तथा नागरिकों की पारस्परिक निर्भरता पर बल देता है।

(3) यह सिद्धान्त इस वास्तविकता को स्पष्ट करता है कि मनुष्य स्वभावतः एक माजिक प्राणी है तथा उसकी सामाजिक प्रवृत्ति ही राज्य को जन्म देती है।

(4) इसमें सामाजिक जीवन की मौलिक एकता पर बल दिया गया है।

(5) इसमें यह भी बताया गया है कि समाज केवल बिखरे हुए व्यक्तियों का तह मात्र नहीं है। समाज के सभी व्यक्ति एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं। सब लकर समाज के कल्याण की बात सोचते हैं।


IN ENGLISH


Question 5. “State is a body.” Critically interpret this statement . B.A. I, Political Science I.
Answer - Under 'Invariant principle, the state is considered as one body. According to it, just as there are different parts of the body and the body is made up of those organs, similarly the state has different components and a state is formed by those elements. Just as the body is not just a group of organs and it also has a separate existence from those organs, similarly though the state is made up of individuals, but separate from these individuals, the state has its own separate existence. Just as there is no existence of organs after separation from the body, similarly, there is no existence of persons apart from the state. Like the body of the creature, the development of the state is also considered. In this way, the Invariant principle does not consider the state as mere imagination, but he puts it in the category of the real body. Just as the organism depends on its own organs, the state and the person also have the same kind of self-reliance. In the words of Garner, "The principle of survival is a zoological notion, which considers the state as a living person, considers the person who created it as similar to the cells of the living body and imagines exactly the same interdependent relationship between the state and the person." As does the relationship between the body and its parts. "
Herbert Spencer and the Savvy Principle
The British thinker Herbert Spencer has given a detailed explanation of the definitive theory of the origin of the kingdom. In his book 'Principles of Sociology', Spencer has tied subtle metaphors between the state and the body. According to him, the state or society is a natural living body, which is in no way different from other living organisms. He has given many similarities and inequalities in the scientific analysis of the state and body composition and development.
Similarities between state and animal body
Spencer has presented the following similarities in state and body
(1) Development - The birth and development of the state and the living body is the same. Initially cells develop in the body, organs develop, then the body attains full development. Similarly, the state started with a person and a family and it continued to grow. Today, the states meet in their developed and vast form.
 (2) Structure - The structure of both the state and the living body is the same. Just as the body is made up of cells, tissues, bone, flesh and marrow etc., similarly the state is also made up of individuals, groups, government and many organizations. Despite having many organs and components, the separate existence of body and state remains intact.
(3) Birth - The birth of both the body and state of life also starts as bacteria.
(4) Organization of the state - The body and organization of the state is also the same. Three parts of the body - life system, division system and exchange system are considered. The brain has complete control over these three systems. This is also the main part of the body. The organization of the state is also similar. In the state also, according to the life system, according to the system of production, the means of transport and communication according to the system of division and the form of government is like a brain. Similarity is found in the channels carrying blood out of the heart and the channels carrying blood from outside to the heart, and the lines of wire going up and down the rail.
(5) Interdependence - mutual dependence is found in both the living body and the state. Just as an organ becomes weak and ill affects the entire body, similarly the health and strength of the state and its prosperity also depends on the individuals and classes of the state. Their actions react to each other. When the body parts do not work properly, the body is harmed. In the same way, if the blacksmith, carpenter, farmer, businessman, etc. in the society, leave their work properly, then it will harm the entire society.
(6) The order of destruction - Just as the body is mortal and it continues to be destroyed, similarly many institutions continue to be destroyed in the state. People who fall ill, move towards destruction and one day die and new people are born in their place. Similarly, in the state too, after the destruction of one institution, another institution is formed.
Thus Spencer has established equality between state and body.
Differences between state and state
Spencer has tried to prove that the state is a body by showing many similarities, however he has envisioned some differences between the state and the earth, the main of which are as follows
(1) In terms of size - the state has no shape and fixed body, whereas the creature has a fixed body, which can be seen and experienced.
(2) From the point of view of affiliation - the body parts of the creature are connected to each other and are related to each other. When a part of the body is separated from the body, its value does not remain, while the organs of the state are separated and remain consciousness.
(3) From the point of view of change - the limbs of a creature are stable, they cannot move from one place to another and cannot change their place among themselves. But the constituents of the state are free to move from one place to another. They can also relocate. For example, the ear cannot do nose work, but can become a peon clerk.
Criticism or limitations of certain principles
The provisional theory of state origin is criticized on the following grounds:
(1) Equality is not perfect - The natural equality of body and state is not perfect. There is a difference between the two. The components of the body have no separate personality, desire and consciousness, they are just parts of matter. But a person has a separate existence, desire and consciousness power. It is right that a person cannot develop his personality fully without the society and the state, but he can live without it. In this regard, Barker has said that "The kingdom is not a living being, but it is like a living being." He is not a living being, because his design is not physical. He is a mental design. He is the organization of various departments for general purpose. "
(2) Difference in theory of evolution - The principles of birth and development of a state or society are different from the theory of birth and development of a person's body, because a person is born by coincidence of man and woman, while the birth of the state in this way Does not happen. The body of the creature itself develops and grows, while the state grows with the cooperation of individuals.
(3) The location of a person is not predetermined - The location of different organs under the body is predetermined and the functions of these organs are determined by natural forces. But the place of the person in the society is not predetermined, the person makes his own place in the society.
(4) No satisfactory explanation of the scope of the state - The principle of what the state should do does not solve this question. Gatell has rightly said, "There is no satisfactory explanation of the nature of the state theory nor can we guide us."
(5) Invariant  principle can have terrible consequences - Accepting the principle of abstinence can have very serious consequences for the freedom of a person. If the state is to be considered a human body, then a person will remain just a means like body parts. As a result of accepting this principle, the personality of the person will be absorbed in the personality of the state and his independent power and authority will end.
(6) Spencer's erroneous use of the theory - The principle of Invariant  has been used mainly by Herbert Spencer and he has drawn conclusions based on this principle which have no match with the principle of Invariant . Spencer has endorsed individualism on the basis of the Savvy Principle, but as Barker has stated, "Zoology and Individualism have proved to be two such precious horses to the creature." Two opposites pull in directions. "
Importance of universal principle
On the basis of the above criticisms, it cannot be said that there is no value or importance of the principle of Invariant . In fact, this principle is very useful for explaining the nature of the state and the relationship between the person and the state.
Gatell explains the utility of this principle as follows
(1) This principle shows the importance of historical development of the state. According to this, the state cannot be considered an artificial object, but it developed.
(2) It emphasizes on mutual dependence of state and citizens.
(3) This theory explains the reality that man is by nature a magic animal and his social instincts give birth to the state.
(4) It emphasizes the fundamental unity of social life.
(5) It also states that society is not merely a fold of scattered persons. All the people of the society are related to each other. Everyone thinks of the welfare of society.
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