जनमत (लोकमत) - परिभाषा तथा व्याख्या

B. A. I, Political Science I 
प्रश्न 16. जनमत किसे कहते हैं ? आधुनिक राज्यों में जनमत निर्माण के क्या साधन हैं
अथवा , लोकमत की परिभाषा दीजिए। स्वस्थ लोकमत के निर्माण की बाधाओं की विवेचना कीजिए। प्रजातन्त्र में लोकमत की भूमिका की विवेचना कीजिए।
अथवा , लोकमत से आप क्या समझते हैं ? स्वस्थ लोकमत के निर्माण हेतु आवश्यक पारिपातियों का वर्णन कीजिए।
अथवा , लोकमत की परिभाषा दीजिए । स्वस्थ लोकमत के निर्माण की शर्तों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर- लोकमत (जनमत) का अर्थ एवं परिभाषाएँ

पायः लोग लोकमत का अर्थ बहुमत अथवा सर्वसम्मति से लेते हैं,जो कि गलत है। कई बार बहुमत भी गलती कर सकता है और वह अल्पसंख्यकों के हितों की उपेक्षा कर सकता है। परन्तु लोकमत उसे कहते हैं जो कि विवेक और स्वार्थ रहित सद्धि के आधार पर आश्रित हो और जिसका लक्ष्य किसी जाति या वर्ग विशेष का हित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज का हित हो । इस प्रकार सार्वजनिक हित के प्रश्नो पर आम जनता की राय को लोकमत कहते हैं और यह लोकमत किसी प्रश्न पर जनता के बहुमत से कुछ अधिक है।

लॉर्ड ब्राइस ने लोकमत की परिभाषा देते हुए लिखा है कि साधारणतया लोकमत का अभिप्राय उन बातों के सम्बन्ध में जिनमें समाज की रुचि होती है अथवा जो समाज पर प्रभाव डालते हैं, उन पर मनुष्यों के जो विचार होते हैं, उनके योग से होता है ।

लोकमत परिभाषा तथा व्याख्या
जिन्सबर्ग के शब्दों में,“लोकमत का अभिप्राय समाज में प्रचलित उन विचारों एवं निर्णयों के समूह से होता है जो सामान्यतः निश्चित रूप से प्रतिपादित होते हैं, जिनमें स्थायित्व का कुछ अंश होता है और जिनके प्रतिपादक उन्हें इस अर्थ में सामाजिक समझते हैं कि वे अनेक मस्तिष्कों के सामूहिक विचार के परिणाम हैं।

रूसो का कहना है कि लोकमत किसी विशेष समय या स्थान में प्रचलित प्रभावपूर्ण विचारधाराओं के आधारों पर निर्मित सार्वजनिक मत है।"

डॉ. बेनी प्रसाद के अनुसार, “यदि बहुसंख्या थोड़े की भलाई को ध्यान में रखकर (अर्थात् सम्पूर्ण समाज की भलाई को सामने न रखकर) कोई मत स्थिर करती है, तो हम उसे जनमत नहीं कह सकते। हम उस मत को जनमत कहते हैं जो समस्त समाज की उन्नति के लिए हो।

 लोकमत की विशेषताएँ

लोकमत की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं

(1) लोकमत सर्वसाधारण का मत है, किसी वर्ग विशेष अथवा कुछ व्यक्तियों का नहीं।

(2) यह मत आवेश पर आधारित न होकर स्थायी मत होता है।

(3) इस मत में लोक-कल्याण की भावना निहित होती है।

(4) लोकमत न तो बहुसंख्यक मत है और न ही एकमत। इसे बहुसंख्यकों का मत केवल इस अर्थ में कहा जा सकता है कि इसमें अल्पमत द्वारा बहुमत के निर्माण के औचित्य की स्वीकृति निहित होती है।

लोकमत निर्माण के साधन

लोकमत निर्माण के प्रमुख साधनों का उल्लेख निम्न प्रकार किया जा सकता है

(1) समाचार-पत्र और पत्रिकाएँ

वर्तमान समय में समाचार-पत्र और पत्रिका लोकमत निर्माण का महत्त्वपूर्ण साधन हैं। लिपमैन ने समाचार-पत्रों को प्रजातन्त्रक का धर्मग्रन्थ' कहा है। समाचार-पत्र खराब सरकार की आलोचना करते हैं और निर्भीकतापूर्वक लोकमत का निर्माण करते हैं। लोकमत को ध्यान में रखकर ही सरकार अपनी नीतियों में परिवर्तन करती है। इस प्रकार समाचार-पत्र जनता औसरकार के मध्य एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं।

(2) रेडियो और टेलीविजन - 

रेडियो और टेलीविजन अब केवल मनोरंजन के साधन मात्र नहीं रह गए हैं। ये जनता को शिक्षा देकर लोकमत का निर्माण करने मे सहायक होते हैं। समाचार-पत्र और पत्रिकाओं का लाभ केवल शिक्षित ही व्यक्ति उठा पाते हैं , किन्तु रेडियो एवं टेलीविजन के द्वारा शिक्षित तथा अशिक्षित, दोनों को ही लाभ प्राप्त होता है।

(3) सिनेमा -

वर्तमान समय में सिनेमा (चलचित्र) ने भी लोकमत निर्माण मे महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है । सिनेमा का जन-साधारण के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है और दर्शकों की भावनाएँ उद्वेलित होती हैं। सिनेमा शिक्षित तथा अशिक्षित दोनों को ही प्रभावित करता है। भारत में सिनेमा ने विधवा पुनर्विवाह, स्त्रियों के स्वतन्त्रता और शिक्षा के पक्ष में तथा दहेज प्रथा, जातिवाद आदि के विपक्ष में स्वस्थ
लोकमत का निर्माण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

(4) शिक्षा संस्थाएँ - 

स्कूल व कॉलेज विद्यार्थियों में नागरिक चेतना उत्पन्न करते हैं। विद्यार्थियों के चरित्र-निर्माण में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान है। यहाँ इतिहास राजनीतिशास्त्र आदि विषयों का समालोचनात्मक दृष्टि से अध्ययन कराया जाता है , इन संस्थाओं के द्वारा विद्यार्थियों को विवेक से कार्य करने व निर्णय लेने में सहायत मिलती है। शिक्षित व्यक्ति लोकमत निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

(5) राजनीतिक दल - 

लोकमत के निर्माण में राजनीतिक दलों का विशेष महत्त्व है। प्रत्येक राजनीतिक दल के कुछ सिद्धान्त, उद्देश्य व आदर्श होते हैं, जिनकी प्राप्ति के लिए वे संगठन का निर्माण करते हैं। वे जनता को अपनी विचारधारा तथा लक्ष्यो से परिचित कराते हैं और अपने पक्ष में अधिकाधिक लोकमत जुटाने का प्रयास करते हैं।

(6) धार्मिक तथा सांस्कृतिक संस्थाएँ  

वर्तमान समय में धार्मिक तथा सांस्कृतिक संस्थाएँ भी लोकमत निर्माण का प्रमुख साधन हैं। धार्मिक संस्थाएँ (मन्दिर,मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरजाघर आदि) लोगों के मिलन के केन्द्र होते हैं, जहाँ उन्हें धार्मिक शिक्षा प्रदान की जाती है । धार्मिक संस्थाएँ धार्मिक विचारों का प्रचार-प्रसार करके लोकमत निर्माण में योगदान देती हैं। इसी प्रकार विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाएँ भी लोगों में किसी विचारधारा विशेष का प्रचार-प्रसार करके लोकमत का निर्माण करती हैं।

(7) सार्वजनिक सभाएँ - 

सार्वजनिक सभाएँ भी लोकमत निर्माण का बहुत बड़ा साधन हैं। मन्त्री जनता में सरकार की नीतियों का प्रचार करते हैं तथा विरोधी दल जनता को सरकार की त्रुटियाँ बताते हैं। इससे लोगों के वही विचार बन जाते हैं जो सार्वजनिक सभाओं में नेताओं द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं।

(8) चुनाव -

लोकमत प्रकट करने का एक महत्त्वपूर्ण साधन चुनाव भी है। प्रत्येक राजनीतिक दल चुनावों के दौरान अपनी विचारधारा तथा कार्यक्रम जनता के समक्ष रखता है । इससे लोगों के राजनीतिक विचार बनते हैं।

स्वस्थ लोकमत के निर्माण हेतु आवश्यक परिस्थितियाँ

स्वस्थ लोकमत निर्माण की शर्ते अथवा आवश्यक परिस्थितियाँ निम्नलिखित हैं

(1) सुशिक्षित जनता - 

स्वस्थ लोकमत के निर्माण के लिए जनता का शिक्षित होना अत्यन्त आवश्यक है। शिक्षा के अभाव में व्यक्ति का मानसिक और बौद्धिक विकास सम्भव नहीं है। ऐसी स्थिति में उनका अपना कोई सुनिश्चित मत नहीं होता, अपितु वह दूसरों के विचारों से प्रभावित होता है।

सोल्टाऊ ने ठीक ही कहा है, "लोकमत प्रबुद्धता की मात्रा, जनता की शिक्षा और बुद्धि के सामान्य स्तर पर निर्भर करता है।"

(2) साम्प्रदायिकता का अन्त - 

स्वस्थ लोकमत के निर्माण में साम्प्रदायिकता एबड़ी बाधा है। इसके द्वारा मानव का दृष्टिकोण व्यापक न रहकर बहुत संकुचित हो जाता है । इसलिए इस भावना का शीघ्रातिशीघ्र अन्त कर देना चाहिए जिससे लोगों का दृष्टिकोण व्यापक हो जाए और वे प्रत्येक महत्त्वपूर्ण प्रश्न को राष्ट्रीय प्रश्न समझकर उसका समाधान करने की चेष्टा में लगे रहें।

(3) स्वतन्त्र और निष्पक्ष प्रेस -

प्रेस की स्वतन्त्रता और निष्पक्षता स्वस्थ लोकमत के लिए बहुत आवश्यक है। समाचार-पत्रों पर सरकारी अथवा गैर-सरकारी किसी प्रकार का दबाव नहीं होना चाहिए और उन्हें सार्वजनिक प्रश्नों पर स्वतन्त्रतापूर्वक अपने विचार व्यक्त करने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए। समाचार-पत्रों की स्वतन्त्रता के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि समाचार-पत्र निष्पक्षता के साथ अपने विचारों को अभिव्यक्ति करें।

(4) स्वस्थ व सुदृढ़ राजनीतिक दल - 

स्वस्थ लोकमत के निर्माण एवं विकास के लिए यह भी आवश्यक है कि राजनीतिक दलों का संगठन दृढ़ और लोक-कल्याण से प्रेरित हो । यदि राजनीतिक दलों का उद्देश्य सम्पूर्ण समाज का हित करना होगा तथा वे जाति, धर्म व सम्प्रदाय के भेदभाव के ऊपर होंगे,तो वे जनता के समक्ष अपनी ओर से सार्वजनिक हित के कार्यक्रम रखेंगे और क्षणिक हितों के लिए झूठा प्रचार भी नहीं करेंगे। परिणामस्वरूप जनता को विभिन्न सामाजिक समस्याओं के सम्बन्ध में अपना मत बनाने में सरलता होगी और स्वस्थ लोकमत का विकास सुगम हो जाएगा।

(5) अत्यधिक आर्थिक विषमता का अनस्तित्व -  

निर्धनता मानवता के लिए अभिशाप है । धन के अभाव में नागरिकों के व्यक्तित्व का समुचित विकास नहीं हो सकता। अत: यह आवश्यक है कि नागरिकों की न्यूनतम आर्थिक आवश्यकताएँ पूरी हों , उनके भोजन, वस्त्र, निवास ,शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की उचित व्यवस्था हो , क्योंकि इनके अभाव में वह अपनी योग्यता और कार्यक्षमता को नहीं बनाए रख सकता। निर्धन व्यक्ति अमीर लोगों के हाथों बिक जाते हैं और उनके पिछलग्गू बन जाते हैं। अतः स्वस्थ जनमत के लिए निर्धनता का उन्मूलन आवश्यक है।

(6) विचार अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता - 

स्वस्थ लोकमत के विकास और निर्माण की एक अन्य आवश्यकता यह भी है कि सभी व्यक्तियों को अपने विचार प्रकट करने की स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए। अल्पसंख्यक वर्गों और दलों को यह अधिकार होना चाहिए कि वे स्वतन्त्रतापूर्वक अपना मत व्यक्त कर सकें और सभी वैध उपायों से दूसरों को अपने विचारों का समर्थक बना सकें । इस अधिकार के साथ एक कर्तव्य यह है कि मतभेद के बावजूद बहुमत के निर्णयों का पालन किया जाए। मनमानी करने से देश में अराजकता फैल सकती है और स्वस्थ लोकमत का विकास नहीं हो सकता।

प्रजातन्त्र में लोकमत का महत्त्व

प्रजातन्त्र में लोकमत के महत्त्व को अग्र प्रकार स्पष्ट कर सकते हैं

 (1) शासन की निरंकुशता पर नियन्त्रण -

प्रजातन्त्र में जब कभी यह देखा जाता है कि सरकार मनमानी करने का प्रयत्न कर रही है, तो लोकमत के द्वारा शासन की निरंकुशता पर नियन्त्रण रखने का कार्य किया जाता है । प्रजातन्त्र में सरकार को स्थायी बनाने के लिए लोकमत के समर्थन तथा सहमति की आवश्यकता होती है । लोकमत के बल पर ही सरकारें बनती और बिगड़ती हैं।

(2) सरकार का पथ - 

प्रदर्शन प्रजातन्त्रीय सरकार में लोकमत सरकार का पथ-प्रदर्शन करता रहता है । लोकमत से सरकार को इस बात की जानकारी रहती है कि जनता क्या चाहती है और क्या नहीं चाहती है । लोकमत से ही सरकार यह जान सकती है कि उसके द्वारा किन कानूनों का निर्माण किया जाए और किनका नहीं।

(3) स्वार्थी राजनीतिज्ञों पर नियन्त्रण -

लोकमत स्वार्थी तथा बेईमान राजनीतिज्ञों और नेताओं पर नियन्त्रण रखता है,जिससे वे सरकार को अपने मित्रों और सम्बन्धियों की स्वार्थ सिद्धि का साधन न बना लें।

(4) विभिन्न संस्थाओं को कर्त्तव्यपालन की चेतावनी - 

लोकमत विभिन्न सामाजिक संस्थाओं को उनके वास्तविक कर्तव्यपालन की चेतावनी देता रहता है। इससे उनमें स्वार्थपरता तथा संकीर्णता नहीं आने पाती। लोकमत इन संस्थाओं को जनता के प्रति उनके कर्त्तव्य बताता है।

(5) नागरिकों की स्वतन्त्रता की रक्षा - 

जब कभी सरकार जनता की स्वतन्त्रता के विरुद्ध कार्य करने के प्रयत्न करती है,तो लोकमत उन्हें इस प्रकार अनुचित कार्य करने से रोककर नागरिकों की स्वतन्त्रता की रक्षा करता है।

स्वस्थ लोकमत के निर्माण में बाधाएँ

स्वस्थ लोकमत के निर्माण के मार्ग में कुछ बाधाएँ हैं, जिनका विवेचन हम निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कर सकते हैं

(1) आर्थिक विकास - 

समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता स्वस्थ लोकमत के निर्माण की एक मुख्य बाधा है । आर्थिक विषमता की स्थिति में अत्यधिक गरीब लोग अमीरों के पिछलग्गू बनकर रह जाते हैं । मतदान के समय अमीर लोग गरीबों के मतों को रुपयों के बल पर खरीद लेते हैं। ऐसी स्थिति में स्वस्थ लोकमत का निर्माण 'सम्भव नहीं होता । आर्थिक विषमता समाज को सम्पन्न व निर्धन,दो वर्गों में बाँट देती है। अतः विविध वर्ग अपने-अपने हितों की दृष्टि से सोचते हैं और इस प्रकार सम्पूर्ण समाज के हित अनुकूल स्वस्थ लोकमत का निर्माण सम्भव नहीं होता।

(2) अशिक्षा - 

स्वस्थ लोकमत निर्माण के मार्ग में अशिक्षा सबसे बड़ी बाधा है। अशिक्षित नागरिक जटिल राजनीतिक एवं आर्थिक मामलों के सम्बन्ध में अपना कोई निजी मत नहीं रखते हैं,क्योंकि उनमें सोचने-विचारने की बौद्धिक क्षमता नहीं होती। वे दूसरों के बहकावे में आकर उनका मत अपना मत बना लेते हैं। धूर्त राजनीतिज्ञ उन्हें सरलता से गुमराह कर सकते हैं।

(3) साम्प्रदायिकता - 

साम्प्रदायिकता की संकीर्ण भावना निश्चित रूप से लोकमत के लिए अभिशाप है । साम्प्रदायिक लोग वर्गीय हितों पर अधिक ध्यान देते हैं और सार्वजनिक हितों की उपेक्षा करते हैं। अतः संकुचित साम्प्रदायिक विचार स्वस्थ लोकमत के निर्माण में एक बहुत बड़ी बाधा है।

(4) दोषपूर्ण राजनीतिक दल - 

यदि राजनीतिक दल सुनिश्चित राजनीतिक और आर्थिक कार्यक्रमों पर आधारित हों, तो वे लोकमत के निर्माण में बहुत सहायक हो सकते हैं। किन्तु यदि इनका निर्माण जाति, धर्म,भाषा या वर्ग के आधार पर हुआ हो, तो वे संकुचित दृष्टिकोण का प्रतिपादन करते हैं । ऐसे दूषित प्रचार द्वारा वे जनता को गुमराह करते हैं और देश की एकता को हानि पहुँचाते हैं। इस प्रकार दोषपूर्ण राजनीतिक दल स्वस्थ लोकमत के निर्माण में बाधा उत्पन्न करते हैं।

(5) प्रचार साधनों पर सरकारी नियन्त्रण -

प्रेस, रेडियो, टेलीविजन आदि प्रचार माध्यमों पर सरकार का नियन्त्रण होने से जनता सही तथ्यों से अवगत नहीं हो पाती है और सरकार द्वारा झूठे प्रचार का शिकार हो जाती है। परिणामतः स्वस्थ लोकमत का निर्माण नहीं हो पाता । तानाशाही में सरकार प्रचार माध्यमों पर पूर्ण नियन्त्रण रखती है तथा लोकमत को अपने हितों के अनुकूल बनाने का प्रयत्न करती है । परन्तु इसे स्वस्थ लोकमत नहीं कहा जा सकता।

(6) पक्षपातपूर्ण समाचार-पत्र

समाचार-पत्र लोकमत निर्माण का सबसे 'प्रभावशाली साधन हैं। यदि समाचार-पत्र निष्पक्ष नहीं हैं, वे धनी व्यक्तियों या सरकार के प्रभाव में हैं, तो वे अपने विचारों की अभिव्यक्ति निष्पक्ष रूप से नहीं कर सकते। ऐसे समाचार-पत्रों को पढ़कर लोग गुमराह हो जाते हैं। अतः पक्षपातपूर्ण समाचार-पत्र स्वस्थ लोकमत का निर्माण नहीं कर सकते, बल्कि वे तो लोकमत को पूर्ण विकृत कर देते हैं।

(7) राष्ट्रीय आदर्शों के सम्बन्ध में मतभेद - 

राष्ट्रीय आदर्शों के सम्बन्ध में मतभेद भी स्वस्थ लोकमत के निर्माण में बाधक होता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी देश में राज्य के शासन के रूप के सम्बन्ध में, समाज की आर्थिक व्यवस्था के रूप के सम्बन्ध में या देश के सामाजिक ढाँचे के रूप के सम्बन्ध में ही मतभेद हो, तो ऐसे देश में स्वस्थ लोकमत का निर्माण सम्भव नहीं होता।

Comments

Post a Comment

Important Question

भारतीय संविधान की 17 प्रमुख विशेषताएँ

शीत युद्ध के कारण और परिणाम

मुगल साम्राज्य - पतन के कारण

प्लासी का युद्ध - कारण, महत्त्व और परिणाम

न्याय की परिभाषा - अर्थ एवं प्रकार

अमेरिका के संविधान की 16 विशेषताएँ

केन्द्र-राज्य सम्बन्ध - in India

व्यवहारवाद- अर्थ , विशेषताएँ तथा महत्त्व

इटली का एकीकरण - मेजिनी, गैरीबाल्डी एवं कैवूर का योगदान