प्रयोजनमूलक हिंदी - अर्थ,स्वरूप, उद्देश्य एवं महत्व

प्रश्न 1: वर्तमान समय में प्रयोजनमूलक हिन्दी की आवश्यकता एवं उपयोगिता पर अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।  

अथवा ‘’ प्रयोजनमूलक हिन्दी का अर्थ समझाते हुए उसके स्वरूप, उद्देश्य एवं महत्व पर विचार कीजिए।

अथवा ‘’प्रयोजनमूलक हिन्दी का अर्थ स्पष्ट कस्ते हुए इसके स्वरूप पर प्रकाश डालिए।  

अथवा ‘’प्रयोजनमूलक हिन्दी की प्रयुक्तियों का परिचय दीजिए।   

अथवा ‘’प्रयोजनमूलक हिन्दी का अर्थबोध स्पष्ट करते हुए इसके विकास की मीमांसा कीजिए।    

अथवा ‘’प्रयोजनमूलक हिन्दी से क्या अभिप्राय है ? प्रयोजनमूलक हिन्दी का स्वरूप सृजनात्मक स्थितियों से गुजर रहा है। समीक्षा कीजिए।

उत्तरप्रयोजनमूलक हिन्दी शब्द का आशय हिन्दी के सर्वाधिक व्यावहारिक एवं सम्पर्क स्वरूप से है जो जनमानस के अनुकूल और जनव्यवहार के लिए सर्वथा सक्षम है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी को अंग्रेजी में 'Functional Hindi' कहा जाता है। हिन्दी की पहचान साहित्य, कविता, कहानी तक ही सीमित नहीं है। आज वह ज्ञान-विज्ञान की सोच को अभिव्यक्त करने का सक्षम समर्थ साधन भी बन चुकी है। इस प्रकार बहुआयामी प्रयोजनों की अभिव्यक्ति में सक्षम, व्यावहारिक एवं प्रशासनिक हिन्दी का स्वरूप ही प्रयोजनमूलक हिन्दी है।

अतः कार्यालयों में प्रयुक्त होने वाली हिन्दी ही प्रयोजनमूलक हिन्दी है। इसका दूसरा नाम व्यावहारिक हिन्दी भी है।

Prayojanmulak Hindi Ka Vargikaran

डॉ. मोटूरि सत्यनारायण की मान्यता है-जीवन की जरूरत की पूर्ति के लिए उपयोग में लाई जाने वाली हिन्दी ही प्रयोजनमूलक हिन्दी है।"

वहीं डॉ. बापूराव देसाई की मान्यता है-साहित्यिक भाषा सिद्धान्त प्रस्तुत करती है तो प्रयोजनमूलक हिन्दी प्रत्यक्ष व्यवहार ।"

डॉ.विनोद गोदरे के अनुसार, जीवन-जगत् की विभिन्न आवश्यकताओं अथवा लोक व्यवहार,उच्च शिक्षा,तन्त्र, जीविकोपार्जन आदि के लिए विशेष अभ्यास ज्ञान के द्वारा विशेष शब्दावली में विशेष अभिव्यक्त इकाइयों एवं सम्प्रेषण कौशल से समाज सापेक्ष व्यावहारिक प्रयोजनों की पूर्ति के लिए प्रयोग की जाने वाली विशेष । भाषा प्रयुक्तियों को प्रयोजनमूलक हिन्दी कहा जाता है।"

प्रयोजनमूलक हिन्दी का स्वरूप, प्रयुक्तियाँ एवं विकास

मानव के सामाजिक जीवन के विभिन्न प्रयोजनों को सम्प्रेषित करने के लिए ही भाषा का उदय और विकास होता है। भाषा दो मुख्य आयामों में यह कार्य करती है-एक सौन्दर्यपरक आयाम में और दूसरा प्रयोजनपरक आयाम में । सौन्दर्यपरक आयाम में भाषा सर्जनात्मक होती है जिसका विकास साहित्य की भाषा के रूप में होता है, जबकि प्रयोजनपरक आयाम का सम्बन्ध सामाजिक आवश्यकताओं और जीवन की उस व्यवस्था से होता है जो व्यक्तिपरक होकर भी समाज सापेक्ष होता है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी के विविध रूपों का आधार उनका प्रयोग क्षेत्र होता है। भिन्न-भिन्न कार्यक्षेत्रों के लिए जिन भाषा रूपों का प्रयोग किया जाता है उन्हें प्रयुक्ति (Register) कहा जाता है-"वस्तुतः भाषा अपने आपमें समरूपी होती है, परन्त प्रयोग में आने पर वह विषमरूपीं बन जाती है। इन्हीं प्रयोगगत भेदों के कारण कई भाषा भेद दिखाई पड़ते हैं; प्रयोजनमूलक हिन्दी जब कार्यालयों, विज्ञान, विधि,बैंक, व्यापार, जनसंचार आदि क्षेत्रों में प्रयुक्त होती है, तब उसमें कई भाषा भेद बन जाते हैं। 

कार्यालयी हिन्दी की शब्द सम्पदा और उसकी संरचना, जनसंचार की शब्द सम्पदा और उसकी संरचना में पर्याप्त भेद देखने को मिलता है। इस प्रकार प्रयोजनमूलक हिन्दी प्रयोजनपरक विभिन्न भाषा-रूपों की समन्वयमा प्रयोजनमूलक हिन्दी का विकास भाषा विज्ञान (Linguistics) की विशिष्ट शाखा अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान (Applied Line रूप में हुआ है। सामाजिक-व्यवहार में विशिष्ट प्रयोजन के लिए प्रयुक्त होने के कारण ही इसे प्रयोजनमूलक कहा जाता है।

डॉ. भोलानाथ तिवारी ने प्रयोजनमूलक हिन्दी के सात रूप माने हैं-

(1) बोलचाल की हिन्दी,

(2) व्यापारी हिन्दी,

(3) कार्यालयी हिन्दी,

(4) शास्त्रीय हिन्दी,

(5) तकनीकी हिन्दी,

(6) साहित्यिक हिन्दी,

(7) सामाजिक हिन्दी।

जबकि डॉ. दिलीप सिंह जी ने इसके पाँच रूप माने हैं

(1) वैज्ञानिक और तकनीकी हिन्दी.

(2) विधि की हिन्दी,

(3) प्रशासनिक कार्यालयी हिन्दी,

(4) जनसंचार माध्यमों की हिन्दी,

(5) वाणिज्य और व्यवसाय की हिन्दी।

प्रयोजनमूलक हिन्दी का स्वरूप गत्यात्मक है। आवश्यकतानुसार यह अपने स्वरूप में परिवर्तन करती रहती है। कार्यालय व्यवसाय संचार,राजनीति आदि क्षेत्रों में यही अभिव्यक्ति का माध्यम है । इसकी अपनी विशिष्ट शब्दावली पद रचना और वाक्य विन्यास है। इसका सरल सुबोध रूप विशिष्ट रचना,प्रक्रिया और पारिभाषिक शब्दावली सरकारी कार्यालयों के काम-काज को सम्पन्न करने में सक्षम है। विभिन्न क्षेत्रों में प्रयुक्त होने वाली हिन्दी की शैलियाँ प्रवृत्तियाँ इसकी जीवन्तता एवं गतिशीलता की द्योतक है। वहीं नवीन प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक उन्नति इसके स्वरूप का विकास कर रहे हैं।

डॉ. कृष्णकुमार गोस्वामी जी की इसके स्वरूप के सम्बन्ध में मान्यता है किप्रकार्य की दृष्टि से प्रयोजनमूलक भाषा तथा साहित्यिक भाषा एक ही है, किन्तु इनके स्वरूप में मूल अन्तर यह है कि साहित्यिक भाषा में अर्थ बहुधा व्यंजनाश्रित और लाक्षणिक होता है, जबकि प्रयोजनमूलक भाषा अभिधापरक और एकार्थी होती है। साहित्यिक भाषा प्रायः अलंकारपूर्ण और अनेकार्थी होती है, जबकि प्रयोजनमूलक भाषा प्राय: अलंकार रहित, सीधी स्पष्ट और स्वतः पूर्ण होती है।"

प्रयोजनमूलक हिन्दी के उद्देश्य-

इसके उद्देश्य अधोलिखित हैं

1. सुयोग्य तथा परिपूर्ण दुभाषियों को तैयार करना जो शासन संचालन तथा समाज की सेवा कर सकें।

2. विभिन्न भाषाओं के मध्य सम्पर्क सेतु का कार्य करना। 

3. भाषा के विभिन्न रूपों शैलियों की जानकारी देना।

4. हिन्दी के द्वारा आदर्श अनुवादक तैयार करना ।

5. हिन्दी भाषा के समन्वयात्मक स्वरूप से अहिन्दी भाषियों को परिचित कराना।

6. वैज्ञानिक एवं तकनीक क्षेत्रों में हिन्दी के अनुप्रयोग से परिचित कराकर उसमें योग्यता हासिल करना।

7. हिन्दी भाषा के अन्य व्यावहारिक पक्षों एवं दैनिक व्यवहार की भाषाई आवश्यकता की संपूर्ति का प्रयास करना।

8. साहित्येतर तथा व्यावहारिक क्षेत्रों में राजभाषा के उद्देश्यों को सफल करने के लिए निपुणता एवं कौशल को विकसित करना ।

9. दैनिक व्यवहार में प्रयुक्त हिन्दी शब्दावली तथा मानक पारिभाषिक शब्दावली का बोध कराना।

महत्व-

आज प्रत्येक क्षेत्र में इसकी पहँच हो चुकी है और यह हमारे प्रत्येक अयाजन की पूर्ति में सक्षम और समर्थ है। इसकी शब्द-सम्पदा एवं पारिभाषिक शब्दावली पूर्णरूप से समृद्ध है। प्रशासन, परिचालन, प्रौद्योगिकी विश्व बाजार तक इसकी पहुंच है। भाषा के मानक रूपों का विकास इसके महत्व को प्रतिपादित करता है।

 

 

 

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