लुई फिलिप - विदेश नीति

 B.A. II, History II
प्रश्न 12. लुई फिलिप की विदेश नीति का वर्णन कीजिए।
उत्तर- लुई फिलिप शान्ति का इच्छुक था और उसकी नीति यूरोप में शान्ति बनाए रखने की थी। किन्तु इसके साथ ही राष्ट्रीय गौरव की रक्षा करना और उसमें वृद्धि करने की भी उसकी इच्छा थी। उसने अन्य राजाओं को अपनी शान्तिप्रिय नीति का आश्वासन देने के लिए अपने दूत भेजे और इस प्रकार यूरोपीय विरोध का निराकरण किया। स्वयं इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया से उसके सम्बन्ध मित्रतापूर्ण थे, यद्यपि पामर्स्टन से वह प्रसन्न नहीं था। उसकी परराष्ट्र नीति मोटे तौर से इंग्लैण्ड की नीति के अनुकूल रही और उसे कभीकभी, जैसे बेल्जियम के मामले में, दबना भी पड़ा। अन्य राज्यों की मान्यता प्राप्त करने में भी उसे त्याग करना पड़ा। यह बात फ्रांस की गौरवप्रिय जनता को, जिसे नेपोलियन के गौरवमय साम्राज्य के दिन याद थे, अत्यन्त अपमानजनक प्रतीत होती थी।

लुई फिलिप की विदेश नीति
लुई फिलिप
लुई फिलिप

इंग्लैण्ड के प्रति नीति -

इंग्लैण्ड और फ्रांस, दोनों में संसदीय शासन पद्धति प्रचलित थी। अतः दोनों में मित्रता हो गई। 1834 ई. में फ्रांस ने इंग्लैण्ड के साथ मिलकर कार्य आरम्भ किया, किन्तु इंग्लैण्ड के साथ मैत्री को फ्रांस
की जनता अपना अपमान समझती थी। अतः फ्रांस के विभिन्न दल फिलिप से बड़े असन्तुष्ट हुए। बाद में पूर्वी समस्या के प्रश्न पर इंग्लैण्ड और फ्रांस में मतभेद भी हो गया। जब टर्की का सुल्तान मिस्त्र के पाशा के साथ युद्ध कर रहा था, तो फिलिप ने व्यावसायिक सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए मिस्र का साथ दिया। इस पर इंग्लैण्ड के विदेश मन्त्री ने फ्रांस से पूछे बिना ही पूर्वी समस्या को हल कर लिया। इसके अतिरिक्त फिलिप ने इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया की इच्छा के विरुद्ध अपने पुत्र का विवाह स्पेन की महारानी की छोटी बहिन राजकुमारी इनफेटा मारिया से कर दिया, क्योंकि वह स्पेन की उत्तराधिकारिणी थी। फलस्वरूप इंग्लैण्ड तथा फ्रांस में मनमुटाव बढ़ गया। दूसरी ओर फ्रांस की जनता ने भी इस सम्बन्ध को राष्ट्रीय हितों के अनुकूल नहीं समझा।

बेल्जियम के प्रति नीति -

 लुई फिलिप ने बेल्जियम को स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सहायता अवश्य दी और फ्रेंच जनता उससे प्रसन्न भी हुई, परन्तु अपनी कूटनीतिक चालों के कारण उसे अपमानित होना पड़ा। उसने विदेश मन्त्री तैलीरा को इंग्लैण्ड भेजा और इस सहायता के बदले लक्जमबर्ग अथवा फिलपविल और मेरियनबर्ग की माँग की, परन्तु पामर्स्टन ने उस माँग को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया और तैलीरों को निराश होकर लौटना पड़ा। इसी प्रकार बेल्जियमवासी लई फिलिप के द्वितीय पुत्र को राजा बनाना चाहते थे, पर इंग्लैण्ड को यह स्वीकार नहीं था, क्योंकि इससे फ्रांस के प्रभाव में वृद्धि हो जाती। इंग्लैण्ड की नाराजगी से फिलिप डर गया और बेल्जियम की गद्दी ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया के चाचा राजकुमार लियोपोल्ड को प्राप्त हुई। यह घटना फ्रांसीसियों के राष्ट्रीय गौरव के लिए अपमानजनक थी। यद्यपि लियोपोल्ड ने फ्रांस की राजकुमारी, से विवाह कर लिया, तथापि वह फ्रांस की जनता का कृपापात्र न बन सका। जो भी हो, लिप्सन का कहना हैं-"लुई फिलिप ने फ्रांस को युद्ध की स्थिति से बचाकर बुद्धिमत्ता का परिचय दिया।"

स्विट्जरलैण्ड के प्रति नीति-

लुई फिलिप की नीति से स्विट्जरलैण्ड में भी उसकी स्थिति सुधरने की जगह निर्बल हो गई। 1815 ई. की वियना कांग्रेस ने नेपोलियन के परिवर्तनों को रद्द करके स्विट्जरलैण्ड को पहले के समान एक शिथिल परिसंघ बना दिया था, परन्तु स्विस जनता नेपोलियन के शासन में बहुत आगे बढ़ चुकी थी और पुरानी स्थिति की पुनर्स्थापना से सन्तुष्ट नहीं थी। वहाँ शीघ्र ही दो आन्दोलन (जनतन्त्रीय और राष्ट्रीय) प्रारम्भ हो गए, एक तो विभिन्न कैण्टनों के जनतन्त्रीय सुधार के लिए और दूसरा उनमें घनिष्ठ एकता स्थापित करने के लिए। परन्तु इन राजनीतिक प्रश्नों के साथ-साथ धार्मिक मतभेद ने स्थिति को जटिल बना दिया। स्विट्जरलैण्ड के समस्त कैण्टनों में सात कैथोलिक तथा प्रतिक्रियावादी थे और शेष प्रोटेस्टेण्ट एवं उदारवादी। सातों कैथोलिक कैण्टनों ने मिलकर 1845 ई. में अपनी पारस्परिक रक्षा के लिए एक संघ बना लिया था। 1847 ई. में दोनों प्रकार के कैण्टनों में संघर्ष प्रारम्भ हो गया। फ्रांस और ऑस्ट्रिया कैथोलिक संघ का समर्थन कर रहे थे और इंग्लैण्ड प्रोटेस्टेण्ट कैण्टनों का। लुई फिलिप सशस्त्र हस्तक्षेप करना चाहता था, परन्तु पामर्टन ने  अपनी कूटनीतिक चालों से ऐसा करने से रोक दिया। अन्त में कैथोलिकों की पराजय हुई। उनका संघ तोड़ डाला गया और स्विट्जरलैण्ड की एकता, जो खतरे में पड़ी हुई थी, पुनर्स्थापित हो गई। लुई फिलिप का प्रतिक्रियावादी कैण्टनों की सहायता के लिए ऑस्ट्रिया का साथ देना फ्रेंच उदारवादियों को बहुत बुरा लगा और उसकी बची-खुची प्रतिष्ठा भी नष्ट हो गई।

पोलैण्ड और इटली के प्रति नीति -

लुई फिलिप के समय में पोलैण्ड और इटली में क्रान्तियाँ हो रही थीं। यूरोप के शासकों के समक्ष इन क्रान्तियों की जटिल समस्या थी। अत: यह भार फ्रांस को सौंप दिया गया। किन्तु फ्रांस ने इस कार्य में कोई रुचि नहीं ली। फिलिप के इस कार्य से फ्रांस के लोग उकता गए, क्योंकि वे तो सैनिक युद्धों के द्वारा अपना गौरव चाहते थे, जबकि लुई फिलिप इसके विरुद्ध था। इतना ही नहीं, यूरोप के नये देश भी फ्रांस का विरोध करने लगे। स्पेन के प्रति नीति-स्पेन की रानी के साथ विवाह के सम्बन्ध में उसने जो स्वार्थी और कुत्सित मनोवृत्ति का प्रदर्शन किया, उससे यूरोप में उसकी बड़ी निन्दा हुई, फ्रांस में भी उसकी प्रतिष्ठा गिर गई और फ्रेंच जनता उससे घृणा करने लगी। इंग्लैण्ड, जिससे उसके सम्बन्ध अच्छे थे और जिसकी सहायता की उसे आवश्यकता थी, नाराज हो गया।

मिस्त्र के प्रति नीति-

इब्राहीम के टर्की साम्राज्य पर आक्रमण के समय टर्की के सुल्तान ने यूरोप के राज्यों से सहायता की प्रार्थना की, परन्तु इंग्लैण्ड और फ्रांस के उस समय बेल्जियम मामले में व्यस्त रहने के कारण टर्की के सुल्तान को अनिच्छा से रूस की सहायता लेनी पड़ी। अपनी सहायता के बदले में सुल्तान को रूस के साथ उनकियर स्केलेसी की सन्धि (जुलाई, 1833) करनी पड़ी, जिसने कुस्तुन्तुनिया में रूस के प्रभाव को चरम सीमा पर पहुंचा दिया। उसने वास्तव में  तुर्क साम्राज्य पर रूस का सैनिक संरक्षण स्थापित कर दिया। 1840 ई. में इंग्लैण्ड, रूस, ऑस्ट्रिया और प्रशा ने लन्दन में एक चतुर्मुख सन्धि की, जिसके अनुसार उन्होंने मुहम्मद अली को दबाने का निश्चय किया। इस सन्धि में फ्रांस को सम्मिलित नहीं किया गया। फ्रेंच जनता ने इसे अपना राष्ट्रीय अपमान समझा और फ्रांस में युद्ध छेड़ने के लिए चारों ओर से माँग होने लगी। पामर्स्टन ने लुई फिलिप की धमकी की परवाह नहीं की। लुई फिलिप को दबना पड़ा। बाद में लन्दन की सन्धि में पामर्टन ने फ्रांस को अवश्य सम्मिलित किया। परन्तु उससे फ्रांस का जो राष्ट्रीय अपमान हो चुका था, वह मिट नहीं सकता था। इस घटना से लुई फिलिप फ्रेंच जनता की दृष्टि में बहुत गिर गया।
वास्तव में यह दुर्भाग्य की बात थी कि सदाशय और विवेकशील होते हुए भी फिलिप विदेश नीति के क्षेत्र में असफल रहा। विदेश नीति के क्षेत्र में फिलिप की दुर्बलता फ्रांसीसियों को अच्छी नहीं लगी। फ्रांस की जनता चाहती थी कि उसका सम्राट् विदेशों में सताये गए राष्ट्रवादियों की मदद करे। 1830 ई. में जब सम्पूर्ण यूरोप में क्रान्तिकारी आन्दोलन भड़क उठे थे, तब फ्रांस आन्दोलन का नेता बन सकता था। लेकिन फिलिप ने उदासीनता दिखाई, जो फ्रांस की जनता को अपमानजनक लगी। किन्तु कुछ कर गुजरने के जोश में फ्रांसीसी जनता ने इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया कि यदि लुई आन्दोलनकारियों की मदद पर उतर आता, तो रूस, प्रशा और ऑस्ट्रिया एक साथ फ्रांस पर आक्रमण कर देते एवं फ्रांस पुनः विदेशी सेनाओं द्वारा रौंद दिया जाता। फिलिप ने धैर्य, कूटनीति और विवेक से काम लेते हुए विदेशी शक्तियों को ऐसा मौका नहीं दिया। उसने फ्रांस को युद्ध में नहीं ढकेला तथा अपने कार्यों से 'जुलाई राजतन्त्र' के लिए विदेशी शक्तियों से मान्यता भी प्राप्त कर ली। फिलिप का यह कार्य तत्कालीन परिस्थितियों में देश के लिए अच्छा था, किन्तु फ्रांस की जनता उसे क्षमा नहीं कर सकी, क्योंकि उसने उनकी गौरव भावना की पूर्ति नहीं की थी।


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