गांधीजी के राजनीतिक विचार

B.A-III-PoliticalScience-II

प्रश्न 9. गाँधीवाद क्या है ? क्या महात्मा गांधी एक राजनीतिक विचारक है ? विवेचना कीजिए।
अथवा '' महात्मा गांधी के राजनीतिक एवं आर्थिक विचारों की व्याख्या कीजिए।
अथवा '' गांधीजी के सत्य और अहिंसा सम्बन्धी विचारों को स्पष्ट कीजिए।
अथवा '' महात्मा गांधी के राजनीतिक दर्शन की विवेचना कीजिए।
अथवा '' राजनीतिक विचारक के रूप में महात्मा गांधी का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर - प्लेटो, एक्विनास, रूसो आदि विचारकों की भांति गांधीजी केवल कल्पना की दुनिया में विचरण करने वाले व्यक्ति नहीं थे, वरन् गांधीजी एक महान् कर्मयोगी थे, जिन्होंने भारत की स्वतन्त्रता के लिए अपने जीवन की आहुति दे दी। गांधीजी के राजनीतिक विचारों को 'गांधीवाद' की संज्ञा दी जाती है।

गांधीजी के राजनीतिक विचार

गांधीजी और सत्य - गांधीजी ने अपनी आत्मकथा 'My Experiments with Truth' में लिखा है कि "मरे निरन्तर अनुभव ने मुझे विश्वास दिया है कि सत्य से भिन्न कोई ईश्वर नहीं है और सत्य की सिद्धि का एकमात्र उपाय अहिंसा है। अहिंसा की पूर्ण सिद्धि से ही सत्य का पूर्ण दर्शन प्राप्त किया जा सकता है ,

गांधीजी के लिए ईश्वर और सत्य में कोई अन्तर नहीं है। उनके लिए ईश्वर सत्य है और सत्य ही ईश्वर है। गांधीजी के धर्म का आधार भी सत्य एवं अहिंसा है। सत्य क्या है, इस सम्बन्ध में गांधीजी ने कहा था,"यह एक बहुत ही कठिन प्रश्न है. प्रश्न स्वयं अपने लिए मैंने हल कर लिया है। तुम्हारी अन्तरात्मा जो कहती है, वही सत्य है।" उन्होंने कहा था,"मेरे लिए सत्य एक ऐसा सिद्धान्त है जिसमें दूसरे और बहुत से सिद्धान्त आ जाते हैं । यह सत्य केवल शब्द में ही सत्यता नहीं है,वरन विचार में भी सत्यता है और न केवल हमारी कल्पना का सापेक्ष सत्य ही है, अपितु पूर्ण सत्य, शाश्वत सिद्धान्त अर्थात् ईश्वर ही है।" इस प्रकार गांधीजी ने सत्य का बहुत व्यापक अर्थ लिया है।

गांधीजी के राजनीतिक विचार

गांधीजी और अहिंसा -

गांधीजी का समस्त दर्शन सत्य और अहिंसा के पवित्र स्तम्भों पर टिका हुआ है। गांधीजी के अनुसार अहिंसा के बिना सत्य अपूर्ण है। वे दोनों एक ही हैं। गांधीजी के अनुसार बुराई का विरोध हिंसा के स्थान पर आत्मिक शक्ति (अहिंसा) के द्वारा करना चाहिए। गांधीजी सत्य और अहिंसा के महान् पुजारी थे। 'Young India' में उन्होंने लिखा है कि "अहिंसा मेरा ईश्वर है और सत्य मेरा ईश्वर है। जब मैं अहिंसा की खोज करता हूँ , तो सत्य कहता है कि इसे मेरे द्वारा प्राप्त करो।" गांधीजी ईश्वर प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन अहिंसा का पालन करना बताते हैं।

कायरता अहिंसा नहीं है

गांधीजी लिखते हैं कि मैं यह जरूर मानता हूँ कि जहाँ केवल कायरता और हिंसा के बीच चुनाव करना हो, वहाँ हिंसा की सलाह दूंगा। मैं चाहूँगा कि भारत अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए भले ही शस्त्रों का आश्रय ले, मगर कायर बनकर अपनी बेइज्जती का निःसहाय साक्षी न बने, मौन न रहे । पर मेरा विश्वास है कि हिंसा से अहिंसा कहीं श्रेष्ठ है,क्षमा में हिंसा की अपेक्षा अधिक वीरत्व है। क्षमा वीरों का भूषण है। पर दण्ड देने की शक्ति होने पर भी दण्ड न देना सच्ची क्षमा है। जब कोई निःसहाय प्राणी क्षमा करने का दम्भ भरता है, तो वह निरर्थक है। परन्तु में भारत को निःसहाय नहीं मानता। बल शारीरिक क्षमता से नहीं, अजेय संकल्प शक्ति से आता है।"

अहिंसा और निर्भयता -

गांधीजी के अनुसार,“अहिंसा और कायरता का कोई मेल नहीं है। मैं पूरी तरह से शस्त्र सज्जित मनुष्य के हृदय में कायर होने की कल्पना कर सकता हूँ। हथियार रखना कायरता नहीं तो कुछ भय का होना जाहिर तो करती है, पर सच्ची अहिंसा शुद्ध निर्भयता के बिना असम्भव है। गांधीजी एक आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी व्यक्ति थे। उनका अहिंसा का सिद्धान्त केवल ऋषया आर विशेष मनुष्यों के लिए नहीं था वरन वह सामान्य जन के लिए भी था। उनके विचार में अहिंसा मानव जीवन का नियम है और हिंसा पर जीवन का। गांधीजी के अनुसार, “बुराई का विरोध हिंसा के स्थान पर आत्मिक शक्ति (अहिंसा) द्वारा करना चाहिए।"

अहिंसा के पक्ष - गांधीजी के अनुसार अहिंसा के दो पक्ष हैं- (1) नकारात्मक, और (2) सकारात्मक।

नकारात्मक रूप में किसी प्राणी को काम, क्रोध तथा विद्वेष के वशीभूत होकर हिंसा अथवा कष्ट न पहुंचना है। गांधीजी के शब्दों में,“अहिंसा का अर्थ पृथ्वी के किसी भी प्राणी को मन,वचन अथवा कर्म से कष्ट न पहुँचाना है।

सकारात्मक स्वरूप वाली अहिंसा को सार्वभौम प्रेम और करुणा की भावना कहा जाता है । इसके चार मूल तत्त्व हैं-प्रेम,धैर्य,अन्याय का विरोध तथा वीरता।

अहिंसा की अवस्थाएँगांधीजी ने अहिंसा की निम्नलिखित तीन अवस्थाएँ बताई हैं

(1) जाग्रत अहिंसा - 

यह अहिंसा का सर्वोच्च रूप है। यह साधन सम्पन्न अथवा वीर पुरुषों की अहिंसा है। इसको अपनाने वाले अहिंसा को बोझ समझकर स्वीकार नहीं करते हैं, वरन् नैतिकता के आधार पर स्वीकार करते हैं। इसे शक्तिशाली व्यक्ति अपनाते हैं और वे शक्तिशाली होकर भी शक्ति का प्रयोग नहीं करते हैं । अहिंसा के इस रूप को केवल राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं, वरन् जीवन के सभी क्षेत्रों में दृढ़तापूर्वक अपनाया जाना चाहिए।

(2) औचित्यपूर्ण अहिंसा - 

अहिंसा के इस रूप को जीवन के किसी भी क्षेत्र में आवश्यकता पड़ने पर औचित्य के अनुसार एक नीति के रूप में अपनाया जाता है। यह अहिंसा निर्बल व्यक्तियों की अहिंसा है या असहाय व्यक्तियों का निष्क्रिय प्रतिरोध । इसमें नैतिक विश्वास के कारण नहीं, वरन् निर्बलता के कारण अहिंसा का प्रयोग किया जाता है।

(3) कायरों की अहिंसा - 

अनेक बार डरपोक अथवा कायर लोग भी अहिंसा को अपनाने का दम्भ भरते हैं। गांधीजी ऐसे लोगों की अहिंसा को कायर व्यक्तियों की निष्क्रिय हिंसा मानते हैं। गांधीजी के अनुसार, “कायरता और अहिंसा पानी तथा आग की भाँति एक साथ नहीं रह सकते हैं।कायरता और हिंसा में से वे हिंसा को अच्छा समझते थे। गांधीजी के मतानुसार जब कायरता व हिंसा में से एक पर चलना हो.तो में हिंसा पर चलना अच्छा समझंगा।

मशरुवाला गांधीजी की अहिंसा के बारे में लिखते हैं कि दूसरे जीव को न मारना ही अहिंसा नहीं है, यह तो अहिंसा का स्थूल अर्थ है । केवल प्राण न लेने से ही अहिंसा पूरी नहीं हो जाती है। अहिंसा का सम्बन्ध मन की शुद्धि से है। जिस शद्धि में कहीं द्वेष की गन्ध तक न हो. वह अहिंसा है। दूसरे के शरीर या मन को पीडान पहँचाना ही धर्म नहीं है। इसे साधारणतया अहिंसा धर्म का बाह्य लक्षण कह सकते हैं।

साध्य और साधन - 

गांधीजी के अनुसार राजनीतिक साधनों की शद्धता उतनी आवश्यक है जितनी कि श्रेष्ठता। गांधीजी ने कहा, "साधन एक बीज की तरह है और उद्देश्य एक पेड़ की तरह । साधन तथा उद्देश्य में वही सम्बन्ध है, जो बीज और पेड़ में । मैं शैतान की पूजा करके ईश्वर भजन के फल को प्राप्त नहीं कर सकता ।उनके अनुसार, “यदि कोई व्यक्ति साधनों का ध्यान रखता है, तो उद्देश्य स्वयं अपना ध्यान रखेंगे। गांधीजी के अनुसार, “न केवल साध्य वरन् साधन भी शुद्ध ही होना चाहिए। उचित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मनुष्य को उचित साधन ही प्रयुक्त करने चाहिए। नीच साधनों से विश्व को कभी स्थायी सुख व सफलता प्राप्त नहीं हो सकती।साधनों की श्रेष्ठता में उनका कितना विश्वास था.यह उनके इस कथन से स्पष्ट है, “मैंने देश की स्वतन्त्रता के लिए अपना समस्त जीवन लगाया है। फिर भी यदि यह मुझे हिंसा द्वारा ही मिल सकती है, तो में इसे नहीं लेना चाहता।"

सत्याग्रह - सत्य और अहिंसा का अटूट सम्बन्ध ही 'सत्याग्रह के विचार को जन्म देता है। इसका अर्थ है-'सत्य के लिए आग्रह' गांधीजी के अनुसार सत्याग्रह का उद्देश्य अन्यायी को कष्ट पहुँचाना कभी नहीं है। इस प्रकार सत्याग्रह दोहरा वरदान है । जो इसका आचरण करता है, उसके लिए भी लाभदायक है और जिसके विरुद्ध यह प्रयुक्त होता है, उसके लिए भी यह वरदान है। गांधीजी के अनुसार सत्याग्रह और निष्क्रिय प्रतिरोध में महान अन्तर है।

गांधीजी के अनुसार सत्याग्रह का प्रयोग निम्न रूपों में हो सकता है

(1) असहयोग  

असहयोग का अर्थ यह है कि हम जिसके विरुद्ध सत्याग्रह करते हैं उससे अपने सम्बन्ध तोड़ लें,उसके साथ सहयोग न करें और कोई काम ऐसा न करें जिससे उसे अपने अनैतिक कार्यों में सहायता अथवा प्रोत्साहन मिले । गांधीजी ने सन् 1920 में राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान इसे व्यावहारिक रूप दिया। असहयोग में निम्न साधन सम्मिलित किए जा सकते हैं

(i) हड़ताल,(ii) सामाजिक बहिष्कार, और (ii) धरना।

(2) सविनय अवज्ञा-  इसका अर्थ है-अनैतिक कानूनों की अवज्ञा । गांधीजी ने सन 1930-31 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाया था।

(3) हिजरत - इसका अर्थ है-स्थायी निवास स्थान का स्वैच्छिक परित्याग। ऐसे व्यक्ति जो अपने आपको पीड़ित अनुभव करते हों;आत्म-सम्मान रखते हुए उस स्थान पर नहीं रह सकते हों और अपनी रक्षा के लिए हिंसक शक्ति नहीं रखते हा, उनके द्वारा हिजरत का प्रयोग किया जा सकता है।

(4) अनशन - यह सत्याग्रह का ही एक रूप है। गांधीजी का विचार था कि अनशन केवल कुछ विशेष अवसरों पर आत्म-शद्धि या अत्याचारी के हृदय परिवर्तन के लिए ही किया जाना चाहिए। ___

गांधीजी तथा धर्म और राजनीति - 

गांधीवाद में धर्म का महत्त्वपूर्ण स्थान है।'Young India' में लिखा था "अपने सार्वजनिक जीवन के प्रारम्भ से ही मैंने जो कुछ कहा है और किया है उसके पीछे एक धार्मिक उद्देश्य रहा है। एक अन्य प्रसंग में उन्होंने कहा था बहुत-से धार्मिक व्यक्ति, जिनसे मैं मिला हूँ छद्मवेश मे  राजनीतिज्ञ हैं । परन्तु मैं कुछ राजनीतिज्ञ का वेश रखता हूँ, किन्तु हृदय से एक धार्मिक व्यक्ति हूँ। गांधीजी के अनुसार धर्म और राजनीति एक-दूसरे के विपरीत नहीं हैं,जैसा कि प्रायः लोग समझते हैं। गांधीजी के शब्दों में, “मेरे लिए धर्महीन राजनीति कुछ नहीं। धर्महीन राजनीति एक मौत का फन्दा है.क्योंकि वह आत्मा का हनन करती है ।पर गांधीजी का धर्म कोई वर्गीय या संकचित धर्म नहीं है। गांधीजी के शब्दों में "जो लोग यह सोचते हैं कि धर्म का राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं है.वे धर्म का अर्थ ही। नहीं जानते हैं।गांधीजी के लिए पूर्ण सत्य ही ईश्वर था।

गांधीजी के अन्य राजनीतिक विचार

(1) राज्य विषयक सिद्धान्त - गांधीजी किसी भी रूप में राज्य की सत्ता के प्रबल विरोधी तथा अराजकतावादी थे। वे दार्शनिक, नैतिक, ऐतिहासिक और आर्थिक कारणों के आधार पर राज्य का विरोध करते थे। अत: उनके सिद्धान्तों को दार्शनिक अराजकता कहा जाता है।

गांधीवादी राज्य का विरोध तीन कारणों से करते हैं। प्रथम, दार्शनिक आधार पर राज्य का विरोध इसलिए किया जाता है कि राज्य में व्यक्ति की नैतिकता के विकास का कोई अवसर नहीं है। द्वितीय, राज्य हिंसा और पाशविक शक्ति पर आधारित है। तृतीय, राज्य के अधिकारों में निरन्तर वृद्धि होती है। इससे व्यक्ति के विकास में बाधा पहँचती है। अत: गांधीजी का उद्देश्य राज्य को समाप्त करना तथा इसके स्थान पर राज्य विहीन लोकतन्त्र की स्थापना करना है। इसमें सभी व्यक्ति सामाजिक जीवन का स्वयमेव अपनी इच्छा से नियन्त्रण करते हैं। मनष्यों का इतना अधिक विकास हो जाता है कि वे अपने कर्तव्यों और नियमों का स्वेच्छापूर्वक पालन करते हैं। इस स्थिति में राज्य जैसी किसी राजनीतिक सत्ता की आवश्यकता नहीं रहती।

गांधीजी का आदर्श राज्य अराजक लोकतन्वीय समाज में सत्याग्रह के सिद्धान्तों का पालन करने वाले व्यक्तियों के स्वावलम्बी प्रामीण समुदायों का संघ है। इस समाज का निर्माण विकेन्द्रीकरण तथा स्वच्छापूर्ण सहयोग के आधार पर होगा। सभी व्यक्तियों के समान अधिकार होंगे तथा सबको अपनी योग्यता के अनुसार समाज सेवा का पूरा अवसर दिया जाएगा। इस समाज में व्यक्तियों को शारीरिक श्रम करना आवश्यक होगा। वे अपनी आवश्यकताओं के लिए अनिवार्य सम्पत्ति से अधिक किसी भी वस्तु का संग्रह नहीं करेंगे।

(2) व्यक्ति का साध्य और राज्य का साथन होना - 

गांधीजी यह समझते थे कि राज्य अपने आप में कोई साध्य नहीं है, अपितु व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी परिस्थितियों को अच्छा बनाने में सहायता देने का साधन है। व्यक्ति राज्य के लिए नहीं, अपितु राज्य व्यक्ति के लिए है। राज्य का प्रधान कार्य सभी व्यक्तियों के अधिकतम हित का सम्पादन करना है। गांधीजी को राज्य पर बहुत अविश्वास था। वे समझते थे कि राज्य शोषण का साधन है और अपने अधिकारों का दुरुपयोग करता है। इसके शक्तिशाली होने से व्यक्तित्व का विकास रुक जाता है। अतः वे राज्य द्वारा उसके अधिकारों का दुरुपयोग होने पर उसके प्रतिरोध करने का अधिकार सत्याग्रही व्यक्ति को प्रदान करते हैं।

(3) राज्य का कार्यक्षेत्र - 

गांधीजी राज्य के कार्यक्षेत्र को अधिकतम मात्रा तक पटाने के पक्ष में थे, ताकि राज्य कम-से-कम शासन करे। अत: वे राज्य के कार्यों को कम करके इन्हें स्वेच्छापूर्वक काम करने वाली संस्थाओं को सौंपना चाहते थे। राज्य के कार्यों का एकमात्र लक्ष्य जनता का कल्याण या सर्वोदय की भावना होनी चाहिए। जन-कल्याण का विरोध करने वाले सभी राजकीय कार्यों का संशोधन या समाप्ति होनी चाहिए। सच्चा लोकतन्त्रीय शासन उसी देश में होता है वहाँ राज्य के हस्तक्षेप के बिना ही सभी कार्य निर्विध रीति से चलते रहते हैं।

(4) प्रभुसत्ता का विरोध

बहुलवादियों की भाँति गांधीजी राज्य की ऐसी निरंकुश प्रभुसत्ता के विरोधी दे जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का प्रधान कर्तव्य आँख मूंदकर राज्य की आज्ञा का पालन करना है। इसके विपरीत गांधीजी विशुद्ध नैतिक सत्ता पर आधारित जनता की प्रभुसत्ता में विश्वास रखते थे। वे नैतिकता का विरोध करने वाले सभी कानूनों का प्रतिरोध करने का व्यक्ति को अधिकार ही नहीं प्रदान करते, अपितु उसका यह कर्तव्य समझते हैं। गांधीजी ने राजकीय कानूनों की अवहेलना को अहिंसात्मक और सविनय बताया है और सत्याग्रही के लिए कड़ी शर्त रखी है ,

गांधीजी के सामाजिक विचार

गांधीजी एक महान् समाज सधारक भी थे। भारतीय समाज का शायद ही कोई ऐसा बीमार क्षेत्र हो जिसे स्वस्थ करने के लिए उन्होंने प्रयत्न न किया हो।

(1) हिन्दू-मुस्लिम एकता-गांधीजी ने हिन्दुओं और मुसलमानों के पारस्परिक द्वेष और घृणा को दर करने का हरसम्भव प्रयास किया। गांधीजी ने सदेव साम्प्रदायिक राजनीति का विरोध किया। उनके अनुसार विभिन्न धर्म एक ही लक्ष्य तक पहुँचने के विभिन्न मार्ग हैं।

(2) दलित वर्ग का उत्थान-गांधीजी अस्पृश्यता को महान् अभिशाप मानते थे। उन्होंने अछूतों को 'हरिजन' नाम दिया और 'हरिजन' नामक समाचार-पत्र के माध्यम से जनता को शिक्षित किया। छुआछुत को समाप्त करने के लिए गांधीजी ने काग्रेस के रचनात्मक कार्यक्रम में भी इसे स्थान दिया। गांधीजी ने हरिजनों को पृथक प्रतिनिधित्व देने के विरोध में आमरण अनशन किया और सन 1932 के पूना समझौते के अन्तर्गत यह पृथक प्रतिनिधित्व वापस ले लिया गया।

(3) स्त्री जाति की उन्नति - गांधीजी ने न केवल स्त्रियों की शिक्षा पर जोर दिया, वरन् वे स्त्रियों को पुरुषों के समान ही आत्म-विकास के समस्त अवसर दिलाने के पक्ष में थे। गांधीजी ने बाल-विवाह का सदैव विरोध किया और विधवा पनर्विवाह का समर्थन किया।

(4) मद्य-निषेध - गांधीजी शराब को अभिशाप समझते थे। उन्होंने अपने रचनात्मक कार्यक्रम में मद्य-निषेध को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया तथा समय-समय पर शराब की दुकानों पर धरना भी दिया।

(5) शिक्षा - गांधीजी ने प्रचलित शिक्षा प्रणाली की आलोचना की। वे बेसिक शिक्षा प्रणाली के पक्षधर थे। इस शिक्षा का उद्देश्य जन-साधारण का सांस्कृतिक पुनर्जागरण करना था। उन्होंने प्रौढ़ शिक्षा पर भी जोर दिया।

गांधीजी के आर्थिक विचार

विकेन्द्रीकरण - गांधीजी राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में शक्ति और धन के केन्द्रीकरण को सब बुराइयों की जड़ समझते थे। अतः वे विकेन्द्रीकरण पर बल देते थे। वे दो कारणों से केन्द्रीकरण के विरोधी थे-पहला कारण, इसका अहिंसक समाज की कल्पना से उग्र विरोध था। दूसरा कारण,केन्द्रीकरण द्वारा व्यक्ति के विकास में बाधा डालने वाले दुष्परिणामों का उत्पन्न होना है।

राजनीतिक क्षेत्र में गांधीजी का विकेन्द्रीकरण से अभिप्राय यह है कि ग्राम पंचायतों को अपने गाँवों का प्रबन्ध और प्रशासन करने के सभी अधिकार दे दिए जाएँ। उनके मामलों में राष्ट्रीय अथवा प्रान्तीय सरकारों का हस्तक्षेप और

नियन्त्रण बहत कम हो जाए। सभी गांव आर्थिक क्षेत्र में स्वावलम्बी तथा राजनीतिक दष्टि से स्वशासन का अधिकार रखने वाले हों। गाँवों में पंचायतें व्यवस्थापिका सभा, कार्यपालिका, सरकार व न्यायपालिका सभी कुछ होंगी। इस प्रकार गाँवों को समस्त अधिकार देकर गांधीजी राजनीतिक सत्ता का पर्ण विकेन्द्रीकरण करना चाहते थे।

आर्थिक क्षेत्र में विकेन्द्रीकरण का अभिप्राय कारखानों में बड़े पैमाने पर मशीनों द्वारा किए जाने वाले उत्पादन के स्थान पर खादी, गुड़, तेल घानी के सदृश लष एवं कुटीर उद्योग स्थापित करना है। गांधीजी आंख मींचकर न तो बडे उद्योगों का विरोध करते हैं और न जहाँ आवश्यक हो, वहाँ उसकी स्थापना के विरुद्ध हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य यह था कि मशीनें व यन्त्र मनुष्य के शोषण का साधन न बनें और वे उसे स्वावलम्बी से परावलम्बान बनाद।

(2) संरक्षकता का सिद्धान्त - समाज की वर्तमान विषमता के दुष्परिणामों का अहिंसक प्रतिकार करने की दृष्टि से इस सिद्धान्त का विशेष महत्त्व है। गांधीजी के संरक्षकता या ट्रस्टीशिप सिद्धान्त के अनुसार धनी लोगों को स्वेच्छापूर्वक यह समझना चाहिए कि उनके पास जो धन है, वह समाज की धरोहर है। वे उसमें से केवल अपने निर्वाह के लिए आवश्यक धनराशि ले सकते हैं, शेष समस्त धनराशि उन्हें समाज की दृष्टि से हितकर कार्यों में लगा देनी चाहिए।

मूल्यांकन संक्षेप में, आचार्य कृपलानी के शब्दों में कह सकते हैं कि राजनीति का सत्य, अहिंसा और साधनों की पवित्रता द्वारा अध्यात्मीकरण करके, अन्याय और निरंकुशता का सत्याग्रह द्वारा सामना कर तथा अपने रचनात्मक कार्यक्रमों द्वारा गांधीजी ने सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक जीवन का संयोग और समन्वय करने का प्रयत्न किया तथा प्रभावकारी लोकतन्त्र की स्थापना करके उन्होंने न्याय और समानता पर आधारित समाज की नींव डालकर विश्व-शान्ति के लिए मार्ग प्रशस्त किया।"

 


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