उपक्रम स्थापना के महत्त्वपूर्ण घटक
प्रश्न 9. "उपक्रम की स्थापना के समय उद्यमी का एकमात्र लक्ष्य उपक्रम का निर्माण करना नहीं होता, वरन् उसकी सफलता एवं विस्तार को सुनिश्चित करना भी होता है।" विवेचना कीजिए।
अथवा "व्यावसायिक विचारों की खोज, विचारों की प्रगति तथा व्यावसायिक वातावरण की जाँच किसी उपक्रम की स्थापना के आवश्यक घटक हैं।" व्याख्या कीजिए।
अथवा ''एक उद्यम को प्रारम्भ करने में
निहित स्तरों की व्याख्या कीजिए।
अथवा '' उपक्रम की स्थापना करते समय
व्यवसायी को किन-किन महत्त्वपूर्ण पहलुओं का अध्ययन करना आवश्यक है ?
उत्तर-उपक्रम की स्थापना एक विशिष्ट कला है, जो उद्यमीय कौशल से परिपूर्ण व्यक्ति विशेष द्वारा की जाती है, क्योंकि नये उपक्रम के प्रवर्तन के लिए व्यवस्थित, संगठित एवं सामूहिक प्रयत्नों की आवश्यकता पड़ती है।
इसलिए प्रो. बैटी का यह कथन सत्य प्रतीत होता है, "उपक्रम की स्थापना के समय उद्यमी का एकमात्र लक्ष्य उपक्रम का निर्माण करना नहीं होता, वरन् उसकी सफलता एवं विस्तार को भी सुनिश्चित करना होता है।"
अतः उद्यमी का अत्यन्त सजग होना आवश्यक है। जब कोई नवीन उपक्रम स्थापित होता है तो न केवल । रोजगार, उत्पादन तथा आय का सृजन होता है, बल्कि वह उपक्रम समाज और राष्ट्र की निरन्तर प्रगति व विकास में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। अत: उपक्रम की स्थापना करते समय प्रारम्भिक व सम्भावित समस्याओं के प्रति उद्यमी का सजग होना अत्यन्त आवश्यक है, इसलिए यह कहा जाता है कि नवीन उपक्रम गीली मिट्टी के समान होता है, जिसे उद्यमी द्वारा उपयुक्त योजना के अनुरूप आकार-प्रकार प्रदान किया जाता है।
उपक्रम स्थापना के महत्त्वपूर्ण घटक या अवस्थाएँ
नवीन उपक्रम की स्थापना एवं विस्तार के
लिए उद्यमी को विभिन्न महत्त्वपूर्ण घटकों या तत्त्वों को ध्यान में रखना पड़ता है
एवं विभिन्न अवस्थाओं से होकर गुजरना पड़ता है। ये महत्त्वपूर्ण घटक निम्नलिखित
हैं-
(I) व्यावसायिक विचारों की खोज-
उचित व्यावसायिक विचारों अथवा अवसरों की खोज व्यावसायिक उपक्रम की स्थापना का महत्त्वपूर्ण घटक है। व्यावसायिक प्रवर्तन का कार्य व्यावसायिक अवसरों की खोज के साथ प्रारम्भ होता है। यह विचार विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न हो सकता है। जैसे-सफल रिश्तेदारों अथवा मित्रों की कहानी, किसी उत्पाद विशेष की बढ़ती हुई माँग, किसी व्यापार, मेले या प्रदर्शन से प्रेरणा, परियोजना रूपरेखा का अध्ययन आदि। यह विचार किसी नये व्यापार को प्रारम्भ करने का अथवा किसी वर्तमान व्यवसाय को अधिगृहीत करने का हो सकता है। किसी भी व्यावसायिक विचार की खोज करने में निम्नलिखित स्रोत महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं
(1) बाजारों का सर्वेक्षण-
बाजार का सर्वेक्षण विभिन्न उत्पादों की
माँग एवं पूर्ति की दशाओं को दर्शाता है। भविष्य की माँग का अनुमान लगाना, फैशन,
आय-स्तर एवं तकनीक आदि में होने वाले परिवर्तनों को ध्यान में रखना
आवश्यक है। उत्पाद के सक्रिय उपभोक्ताओं के नमूने एवं माँग की प्रवृत्ति सुनिश्चित
करने का प्रयास करना चाहिए। बाजार निरीक्षण के द्वारा प्रतिस्पर्द्धा एवं कीमत
प्रवृत्तियों का भी बोध हो जाता है। बाजार निरीक्षण एवं उत्पाद विश्लेषण को पूर्ण
करने के लिए पेशेवर विशेषज्ञों; जैसे-डीलर्स, विज्ञापन एजेन्सियों, परामर्शदाताओं आदि की सहायता
भी प्राप्त की जा सकती है।
(2) भावी उपभोक्ताओं से सम्बन्ध-
भावी उपभोक्ताओं से सम्बन्ध यह स्वतः
प्रकट करता है कि उत्पाद अथवा सेवाओं में क्या विशेषताएँ होनी चाहिए। व्यवसाय को
चलाने में उपभोक्ता की महती भूमिका होती है। अत: उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं एवं
पसन्द से सम्बन्धित समंक अवश्य एकत्र किए जाने चाहिए।
(3) व्यापार मेले तथा प्रदर्शनियाँ-
राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार
मेले व्यावसायिक विचार का एक उत्तम स्रोत हैं। इन मेलों में उत्पादक एवं
पूर्तिकर्ता अपने उत्पादों का प्रदर्शन करते हैं। इन उत्पादों में अधिकांश उत्पाद
नये होते हैं। इन मेलों में उत्पादन, क्रय, सह-संगठन, डीलरशिप आदि पर सौदा एवं समझौता वार्ता होती है।
(4) सरकारी संस्थाएँ–
विभिन्न सरकारी संस्थाएँ उद्यमियों को
व्यावसायिक विचार की खोज करने में अत्यधिक सहायक सिद्ध होती हैं। विनियोग केन्द्र, राज्य औद्योगिक
विकास बैंक, तकनीकी सलाह संगठन, निर्यात
संवर्द्धन समिति आदि विभिन्न संस्थाएँ उद्यमियों को तकनीकी, वित्तीय
एवं अन्य व्यावसायिक सलाह व सहायता प्रदान करती हैं। व्यापार एवं उद्योग पर
प्रकाशित सरकारी प्रकाशन भी नवीन व्यावसायिक विचार खोजने में सहायक हो सकते हैं।
(5) अन्य राष्ट्रों का विकास-
सामान्यतः विकसित देशों के फैशन, चलन
आदि का अनुसरण अविकसित देशों के लोगों द्वारा किया जाता है। अतः एक उद्यमी एक
अच्छे व्यावसायिक विचार को प्राप्त कर सकता है, यदि वह
विकसित राष्ट्रों में होने वाले नवीनतम विकास पर ध्यान रखे।
(6) परियोजनाओं की रूपरेखा का सूक्ष्म परीक्षण-
अनेक सरकारी व निजी एजेन्सियों द्वारा
समय-समय पर विभिन्न उद्योगों वं परियोजनाओं की रूपरेखा का प्रकाशन किया जाता है।
एक उचित व्यवसाय चुनने में ऐसी परियोजनाओं की रूपरखा का सूक्ष्म परीक्षण अति सहायक
सिद्ध हो सकता है। किन्तु इस कार्य को सम्पन्न करने व सफल बनाने हेतु तकनीकी व
अन्य विशेषज्ञों को नियुक्त किया जाना चाहिए।
(7) अन्य स्रोत–
उपर्युक्त स्रोतों के अतिरिक्त
व्यावसायिक विचारों को खोजने में अप्रयुक्त संसाधन, असन्तुष्ट माँग,
नवीन आविष्कार, निम्न कोटि के उत्पाद आदि
स्रोत भी सहायक सिद्ध होते हैं।
(II) विचारों का विश्लेषण एवं चयन-
व्यावसायिक उपक्रम की स्थापना करते समय
दूसरा महत्त्वपूर्ण घटक विचारों का विश्लेषण एवं चयन है, जिसका
ध्यान रखना आवश्यक है। विचारों के चयन से पूर्व उसका विस्तृत विश्लेषण किया जाता
है, जिसको निम्नलिखित अवस्थाओं में विभक्त किया गया है
(1) विचार मूल्यांकन एवं परीक्षण–
व्यावसायिक विचारों की खोज के पश्चात्
उसका विश्लेषण एवं परीक्षण किया जाता है। इस हेतु निम्नांकित तथ्य महत्त्वपूर्ण
हैं-
(i) तकनीकी सुगमता-
तकनीकी सुगमता से आशय किसी उत्पाद का
उत्पादन करने की सम्भावनाओं से है। इसका निर्णय मशीन, श्रम
कौशल, कच्चा माल, आवश्यक तकनीकों की
उपलब्धता आदि के आधार पर किया जाता है। इसको मापने के लिए तकनीकी विशेषज्ञों की
सलाह एवं सहायता भी आवश्यक हो सकती है।
(ii) वाणिज्यिक सुगमता-
वाणिज्यिक सुगमता से आशय प्रस्तावित
परियोजना की. सजीवता एवं अवसरों को आँकने के लिए बाजार दशाओं तथा प्रचलित
स्थितियों का विस्तृत अध्ययन करने से है। इस अध्ययन के अन्तर्गत विभिन्न संगणनाएँ
करनी होती हैं; जैसे—सम्भावित माँग, विक्रय कीमत, उत्पादन लागत, सम-विच्छेद
बिन्दु, अनुमानित विक्रय मात्रा आदि।
(2) विस्तृत विश्लेषण-
विचारों के प्रारम्भिक मूल्यांकन के
पश्चात् उपयुक्त विचार का समस्त दृष्टिकोणों से विश्लेषण किया जाता है। यह अवस्था
काफी महत्त्वपूर्ण होती है, क्योंकि विचार की स्वीकृति अथवा अस्वीकृति का
निर्णय इसी अवस्था पर किया जाता है। प्रस्तावित परियोजना की तकनीकी सुगमता एवं
आर्थिक सजीवता की पूर्ण जाँच-पड़ताल की जाती है एवं उस विचार का वित्तीय एवं
प्रबन्धकीय सुगमता की दृष्टि से भी परीक्षण किया जाता है। सम्पूर्ण विश्लेषण के
पश्चात् निष्कर्षों को प्रतिवेदन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
(3) उपयुक्त विचार का चुनाव-
परियोजना प्रतिवेदन प्राप्त होने पर
उसका विश्लेषण कर उपयुक्त विचार का चयन कर लिया जाता है। विचार का चयन करते समय यह
ध्यान रखना चाहिए कि कोई उत्पाद सरकार द्वारा प्रतिबन्धित तो नहीं है तथा किस
उत्पाद के लिए अनुदान या सरकारी प्रोत्साहन उपलब्ध है। इसके साथ-साथ कौन-से उत्पाद
की माँग उसकी पूर्ति से अधिक है व किस उत्पाद में उच्च लाभदायकता है। कौन-सा
उत्पाद देश की औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति के अनुरूप है आदि।
(III) व्यावसायिक वातावरण की जाँच–
व्यावसायिक विचार के विश्लेषण एवं चयन
के पश्चात् व्यावसायिक परिदृश्य अथवा वातावरण का मूल्यांकन अपरिहार्य होता है।
व्यावसायिक परिवेश अनेक आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक, राजनीतिक एवं शासकीय तत्त्वों का सम्मिश्रण होता है। अत: आज के गतिशील
प्रतिस्पर्धात्मक परिवेश में उपक्रम को स्थापित एवं संचालित करना एक महत्त्वपूर्ण
कौशल है। उद्यमी को ग्राहकों, पूर्तिकर्ताओं, मध्यस्थों एवं प्रतिद्वन्द्वियों के मानसिक दृष्टिकोण तथा सरकारी नीतियों
व आर्थिक तत्त्वों के साथ-साथ प्राकृतिक एवं भौगोलिक तत्त्वों के मध्य उचित
तारतम्य भी स्थापित करना पड़ता है। व्यावसायिक वातावरण की उपयुक्त जाँच व्यावसायिक
उपक्रम को उन्नति के पथ पर अग्रसर कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
(IV) आवश्यक संसाधनों को जुटाना-
उपक्रम को प्रारम्भ करने के लिए उद्यमी
आवश्यक संसाधन जुटाता है। उसे आवश्यक वित्त की व्यवस्था करना होती है, भूमि,
भवन, मशीनरी, प्लाण्ट,
फर्नीचर आदि खरीदने होत ह एव कर्मचारियों की नियुक्ति
करनी होती है। इन संसाधनों को निम्न भागों में विभक्त किया
गया है-
(1) सूचनाएँ-
सूचनाओं का एकत्रीकरण एक महत्त्वपूर्ण
कार्य है। उत्पाद अथवा सेवा की माँग का आकार एवं प्रकृति, पूर्ति
की मात्रा एवं स्त्रोत, उत्पाद की कीमत, लागत-मात्रा सम्बन्ध आदि से सम्बन्धित सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं। तकनीकी,
संयन्त्र एवं मशीनों के पूर्तिकर्ताओं, आवश्यक
कर्मचारियों की संख्या एवं स्रोत, कच्चे माल के स्रोत,
प्रतिस्पर्द्धा की प्रकृति, आवश्यक कोषों के
स्रोत से विभिन्न सूचनाएँ प्राप्त करना उद्यमी का कार्य है। सूचनाओं के एकत्रीकरण
व उनको सुरक्षित रखने में कम्प्यूटर का उपयोग अत्यधिक सहायक होता है।
(2) वित्त की व्यवस्था-
किसी भी व्यवसाय को सुदृढ़ बनाने के लिए
वित्त अति आवश्यक है। वित्त किसी भी व्यवसाय का जीवन-रक्त होता है। व्यवसाय में
लगे वित्त को व्यवसाय की पूँजी कहा जाता है। स्थायी सम्पत्तियों में लगा वित्त 'स्थायी
पूँजी' एवं चालू सम्पत्तियों में लगा वित्त कार्यशील पूँजी'
कहलाता है। व्यवसाय के लिए आवश्यक कोषों का अनुमान लगाने के बाद
उसके स्रोतों को ढूँढना एवं स्रोतों से प्राप्त होने वाले वित्त का अनुपात
सुनिश्चित करना पूँजी संरचना' कहलाता है।
(3) कर्मचारियों का प्रबन्ध–
उपक्रम हेतु कर्मचारियों का चयन करना भी
एक महत्त्वपूर्ण तथा परम आवश्यक कार्य है। कर्मचारी उपक्रम की एक महत्त्वपूर्ण
कड़ी है। कर्मचारी उपक्रम की न हासित होने वाली सम्पत्ति होती है। कर्मचारियों का
चयन आवश्यकतानुसार किया जाना चाहिए। भर्ती के स्रोत ज्ञात करके कर्मचारियों का चयन
विधिसम्मत ढंग से करना चाहिए। उद्यमी को कर्मचारियों के निष्पादन मूल्यांकन की
व्यवस्था करनी चाहिए तथा उनकी सुरक्षा, कल्याण व स्वास्थ्य हेतु प्रदान की जाने वाली
सुविधाओं का ध्यान रखना चाहिए। इनको उपलब्ध कराना उद्यमी का महत्त्वपूर्ण कर्तव्य
है।
(V) उद्यम स्थापना-
ऊपर वर्णित कार्यविधि पूर्ण हो जाने के
उपरान्त व आवश्यक संसाधनों के एकत्र हो जाने के पश्चात् उपक्रम का कार्यशील ढाँचा
तैयार करने की कार्यवाही की जाती है। इसे निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत स्पष्ट
किया जा सकता है
(1) संगठन-संरचना-
उद्यमी अपने द्वारा चयनित विचार के
अनुरूप उपक्रम का संगठन करते हैं । व्यावसायिक विचार के अनुरूप उपक्रम का आकार
निर्धारित करते हैं। एकल स्वामित्व, साझेदारी संगठन, संयुक्त
पूँजी वाली कम्पनी या सहकारी संगठन के रूप में वैधानिक कार्यवाही को पूर्ण कर
उद्यमी द्वारा अपने विचार को मूर्त रूप प्रदान किया जा सकता है।
(2) व्यावसायिक संगठन-
उद्यमी को व्यवसाय के विभिन्न पहलुओं के
सम्बन्ध में समग्र योजनाएँ बनानी पड़ती हैं, जो निम्नलिखित हैं-
(i) उत्पाद नियोजन-
उत्पाद नियोजन से आशय उत्पादित किए जाने
वाले उत्पाद के सम्बन्ध में योजना बनाने से है। प्रस्तावित वस्तु के सम्बन्ध में
योजना बनाते समय उद्यमी को यह पता लगाने का प्रयास करना चाहिए कि लोगों की
आवश्यकताएँ क्या हैं ? उद्यमी को लोगों की आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पाद
को डिजायन करना चाहिए। उद्यमी को विशिष्ट उत्पाद के सम्बन्ध में सम्भावित परिणामों
पर मनन करना, उत्पाद के सधार के तरीकों पर विचार करना,
मितव्ययी उत्पादन पद्धति बनाना. उत्पाद के पैकिंग, ब्राण्ड नाम आदि की योजना बनाना आदि तथ्यों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
(ii) उत्पादन नियोजन-
उत्पाद के व्यवस्थित एवं मितव्ययी
उत्पादन के लिए उत्पादन नियोजन परम आवश्यक है। इस हेतु उत्पादन कार्य के
निम्नांकित पहलुओं का नियोजन किया जाता है-
(a) संयन्त्र अभिन्यास का नियोजन,
(b) उत्पादन प्रणाली का नियोजन,
(c) कारखाना परिसर, भवन एवं
उपकरणों का नियोजन,
(d) उत्पादन
कार्यक्रम का नियोजन आदि।
(iii) वित्तीय नियोजन-
वित्तीय नियोजन का आशय उन सम्पत्तियों
के प्रकार सम्बन्धी निर्णय लेने एवं इन सम्पत्तियों में निवेश की सीमा से है, जिनमें
वित्तीय संसाधन निवेशित होते हैं। सामान्यत: उद्यमी को यह कदम उठाना होता है कि वह
कुल वित्त में से कम-से-कम पूँजी निवेशित करे व अधिकतम माल उधार ले।
(iv) कोष नियोजन-
उद्यमी का महत्त्वपूर्ण कार्य कोषों का
बुद्धिमत्तापूर्वक सदुपयोग करना है। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में उद्यमी को फण्ड निवेश
के सम्बन्ध में वैज्ञानिक ढंग से सोचना होता है। उद्यम के आकार एवं प्रौद्योगिकी
का ज्ञान तथा धन एकत्रीकरण एवं व्यय सम्बन्धी जानकारी आवश्यक होती है।
(v) लाभ नियोजन-
लाभ नियोजन उत्पादन रेखा के चयन में
मूल्य निर्धारण, लागत तथा उत्पादन परिमाण की ओर संकेत करता है। अत:
लाभ नियोजन निवेश एव वित्त सम्बन्धा निणय का एक पूवापक्षा है।
(vi) विपणन नियोजन-
विपणन नियोजन उपक्रम के समग्र नियोजन का
एक भाग है। इसके अन्तर्गत निम्नलिखित घटकों के सम्बन्ध में निर्णय लेने होते है-
(a) कीमत नियोजन-
उद्यमी के द्वारा प्रथम बार उत्पाद का
मूल्य निर्धारण करना एक समस्या होती है। कीमत निर्धारण करते समय उत्पाद की
सम्भावित माँग, माँग (लोच) के सन्दर्भ में मूल्य, लक्ष्य समूह एवं उनकी क्रय-शक्ति, प्रचार की नीति,
विक्रय पद्धति व उनके व्ययों को ध्यान में रखना चाहिए।
(b) वितरण नियोजन-
उद्यमी को उत्पाद के वितरण हेतु उपयुक्त
माध्यम का चुनाव करते समय नेटवर्क पर ध्यान देना चाहिए। वितरण की कड़ी जितनी छोटी
होती है,
नियन्त्रण उतना ही प्रभावी होता है। वितरण पद्धति बाजार पहुँच के
साथ-साथ मितव्ययी भी होनी चाहिए।
(c) विक्रय संवर्द्धन-
वस्तुओं के सफल विक्रय के लिए कुशल
विक्रेताओं की भर्ती करनी चाहिए तथा विक्रय संवर्द्धन के विभिन्न माध्यमों; जैसे—विज्ञापन एवं बिक्री बढाने के अन्य उपायों पर विचार करना चाहिए।
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