लॉर्ड विलियम बैन्टिक - सुधार कार्य


MJPRU-BA-III-History I-2020
प्रश्न 6. लॉर्ड विलियम बेण्टिंक(बैंटिक)(बैन्टिक) (William Bentinck)द्वारा किए गए सुधारों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर - लॉर्ड विलियम बैन्टिक 1828 ई. में गवर्नर-जनरल बनकर भारत आया और 1835 ई. तक ब्रिटिश भारत का गवर्नर-जनरल रहा। बैन्टिक ऐसा प्रथम गवर्नर-जनरल था जिसने ब्रिटिश होते हुए भी भारतीयों की शोचनीय दशा की ओर ध्यान दिया। उसके हृदय में मानवता के प्रति अपने कर्तव्य निर्वाह की महान् भावना
लॉर्ड विलियम बेण्टिंक - सुधार कार्य

निहित थी। वह शान्ति की नीति का समर्थक था। उसका विचार था कि भारतीय नरेशों एवं प्रजा के साथ नम्रता का व्यवहार करके ही उनके हृदय में ब्रिटिश शासन के प्रति सम्मान की भावना उत्पन्न की जा सकती है और इस भावना के विकसित होने पर ही भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का अस्तित्व सुरक्षित तथा स्थायी रह सकता है।


लॉर्ड विलियम बेण्टिंक द्वारा किए गए सुधार

लॉर्ड विलियम बेण्टिंक(बैन्टिक) द्वारा किए गए प्रमुख सुधारों को निम्नलिखित शीर्षकों के आधार पर स्पष्ट कर सकते हैं

(I) प्रशासनिक सुधार-

लॉर्ड कॉर्नवालिस ने उच्च नौकरियों के द्वार भारतीयों के लिए बन्द कर दिए थे, जिससे शिक्षित भारतीय वर्ग में
बड़ा असन्तोष व्याप्त हो गया था। बेण्टिंक ने उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति के सम्बन्ध में कॉर्नवालिस की नीति को बदल दिया। उसने 1831 ई. में एक अधिनियम पारित किया, जिसके अनुसार मुंसिफ, सदर अमीन आदि उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति की जाने लगी। इस प्रकार बेण्टिंक ने नौकरियों का भारतीयकरण कर दिया, जिससे कम्पनी के प्रशासनिक व्ययों में काफी कमी आई। भारतीयों में भी ब्रिटिश शासन के प्रति आदर का भाव उत्पन्न हुआ।

(II) न्याय व्यवस्था में सुधार

जिस समय बेण्टिंक गवर्नर-जनरल बनकर भारत आया, उस समय देश की न्याय व्यवस्था बड़ी खराब थी और न्याय प्राप्त करने में काफी समय लग जाता था। अत: उसने इस क्षेत्र में अनेक सुधार किए। ये सुधार निम्नलिखित थे
(1) बेण्टिंक ने प्रान्तीय दौरा व अपील के न्यायालयों को समाप्त कर दिया।
(2) उसके द्वारा आगरा में दीवानी तथा फौजदारी अपील का एक उच्च न्यायालय स्थापित किया गया।
(3) उसने इलाहाबाद में सदर दीवानी तथा सदर निजामत नामक उच्च अदालतें स्थापित की।
(4) उसने कलेक्टर और मजिस्ट्रेट के पदों को मिलाकर एक कर दिया।
(5) उसने कमिश्नरों की नियुक्ति की, जो कई जिलों का प्रशासन देखते थे।
(6) भारतीय जनता की सुविधा के लिए न्यायालयों का सारा काम प्रान्तीय भाषा में करने की व्यवस्था की गई।
(7) बंगाल में ज्यूरी प्रथा प्रारम्भ की गई।
(8) इलाहाबाद में 'बोर्ड ऑफ रेवेन्यू' की स्थापना की गई।
(9) शारीरिक व कष्टदायक दण्डों को बन्द कर दिया गया और कोड़े लगवाने की प्रथा को भी समाप्त कर दिया गया।

(III) सामाजिक सुधार- 

लॉर्ड विलियम बेण्टिंक से पहले किसी अन्य गवर्नर-जनरल ने सामाजिक समस्याओं को इतने साहसपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयत्न नहीं किया। उसके द्वारा किए गए समाज-सुधार सम्बन्धी कार्य निम्नलिखित

(1) ठगी का अन्त-

उस समय उत्तर भारत में ठगों का बोलबाला था। ये व्यापारियों तथा धनवान लोगों को राह चलते लूट लेते थे और उनकी हत्या कर देते थे, इसलिए आवागमन असुरक्षित एवं कठिन हो गया था। बेण्टिंक ने कर्नल स्लीमैन को ठगों का दमन करने का दायित्व सौंपा। स्लीमैन ने बड़ी सतर्कतापूर्वक उनके रहने के स्थानों का पता लगाया तथा सेना की सहायता से उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इनमें से अधिकांश को फाँसी दे दी गई और शेष को देश से निकाल दिया गया।

(2) नर बलि एवं कन्या शिशु हत्या का अन्त-

उस समय कुछ लोग कार्यसिद्धि के लिए तथा कुछ लोग देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए नर बलि देते थे। बेण्टिंक ने इसे निषिद्ध कर दिया। उसने राजपूतों में प्रचलित कन्या शिशु हत्या को भी बन्द करवाया।

(3) सती प्रथा का अन्त

राजा राममोहन राय के प्रयासों के फलस्वरूप 1829 ई. में बेण्टिंक ने सती प्रथा को गैर-कानूनी घोषित कर दिया। साथ ही ऐसा करने वाली स्त्री को या ऐसा करने के लिए बाध्य करने वाले लोगों को भी दण्डित करने की घोषणा की।

(4) दास प्रथा का अन्त-

1832 ई. में बेण्टिंक ने एक नया कानून बनाकर भारत में प्राचीन काल से प्रचलित दास प्रथा को समाप्त कर दिया।

(5) धर्म परिवर्तन की सुविधा -

हिन्दुओं में परम्परागत नियम के अनुसार धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति पैतृक सम्पत्ति से वंचित हो जाता था। बेण्टिंक ने यह नया नियम बनाया कि हिन्दुओं तथा मुसलमानों के उत्तराधिकार के नियम सिर्फ इन धर्मों के अनुयायियों पर ही लागू होंगे। जो लोग ईसाई धर्म स्वीकार करेंगे, वे पैतृक अधिकार से वंचित नहीं होंगे।

(6) प्रेस की स्वतन्त्रता- 

समाचार-पत्रों के प्रति बेण्टिंक की नीति काफी उदार थी। 1835 ई. में उसने प्रेस पर लगे प्रतिबन्ध को पूर्णतया समाप्त कर दिया तथा भारतीयों को पत्र-पत्रिकाओं द्वारा अपने विचार अभिव्यक्त करने की स्वतन्त्रता दे दी।

(IV) आर्थिक सुधार

जिस समय बेण्टिंक गवर्नर-जनरल बनकर भारत 'आया, उस समय तक कम्पनी की आर्थिक स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो चुकी थी।
अत: उसने कम्पनी की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए अनेक कार्य किए। उसके द्वारा किए गए आर्थिक सुधार निम्नलिखित थे-

(1) रय्यतवाड़ी प्रथा को लागू करना- 

बेण्टिंक ने संयुक्त प्रान्त में भूमि का तीस वर्षीय बन्दोबस्त कराया और मद्रास में रय्यतवाड़ी प्रथा लागू की। इस रय्यतवाड़ी प्रथा के अनुसार किसान सीधे ही सरकारी खजाने में लगान जमा कर सकते थे। इससे पूर्व जमींदार मध्यस्थ होते थे। इससे किसानों को बड़ी राहत मिली, साथ ही कम्पनी की आय में भी वृद्धि हुई।

(2) वेतन में कटौती- 

बेण्टिंक से पूर्व कम्पनी के कर्मचारियों तथा अधिकारियों को अधिक वेतन मिलता था। बेण्टिंक ने इस वेतन को अधिक मानकर असैनिक पदाधिकारियों के वेतन में कमी कर दी। इससे प्रशासनिक विभाग का व्यय बहुत कम हो गया।

(3) भत्तों में कमी- 

सैनिक विभाग के अतिरिक्त उसने सभी विभागों के पदाधिकारियों के भत्तों को समाप्त कर दिया। इससे भी कम्पनी की आर्थिक स्थिति में अपेक्षित सुधार हुआ।

(4) न्याय विभाग के खर्चों में कटौती-

 बेण्टिंक ने अपील और दौरा करने वाले न्यायालयों को समाप्त कर दिया। इससे भी कम्पनी के व्ययों में पर्याप्त कमी

 (5) अफीम के व्यापार पर नियन्त्रण-

बेण्टिंक ने अफीम के व्यापार पर सरकारी नियन्त्रण स्थापित किया और मालवा में उत्पन्न होने वाली अफीम को व्यापारियों को ठेके पर बेचा। इससे कम्पनी को बहुत अधिक लाभ प्राप्त हुआ।

(6) मालगुजारी की वसूली- 

बेण्टिंक ने मालगुजारी से सम्बन्धित कागजातों की जाँच कराई और जिन लोगों ने कई वर्षों से मालगुजारी नहीं दी थी, उनसे कठोरतापूर्वक मालगुजारी वसूल की। जहाँ लगान वसूल करने आदि की समुचित व्यवस्था नहीं थी, वहाँ उसने लगान वसूली की समुचित व्यवस्था की। इससे कम्पनी के आर्थिक ढाँचे में अपेक्षित सुधार हुआ।

(7) माफी की भूमि का अधिग्रहण - 

अनेक देशी नरेशों ने लोगों के कार्यों से प्रसन्न होकर उन्हें बहुत-सी भूमि दे दी थी। इसे ही माफी की भूमि कहा जाता था, क्योंकि राजा इस भूमि से लगान नहीं लेते थे। बेण्टिंक ने लोगों से ऐसी भूमि अधिगृहीत कर ली। इससे कम्पनी की आय में तो वृद्धि हो गई, लेकिन इससे जनता में अत्यधिक असन्तोष व्याप्त हो गया।

(8) व्यापार में सुधार

बेण्टिंक ने पंजाब के शासक रणजीत सिंह और सिन्ध के अमीरों से व्यापारिक सन्धियाँ की, जिससे अंग्रेजों को सिन्ध तथा सतलज नदियों से स्वतन्त्रतापूर्वक व्यापार करने का अधिकार प्राप्त हो गया। इससे भी कम्पनी की आय में बहुत वृद्धि हुई।

(V) शैक्षिक सधार- 

कम्पनी के संचालकों द्वारा भारतीय जनता को शिक्षित करने के लिए 1 लाख प्रतिवर्ष खर्च करना निश्चित किया गया था, लेकिन यह समस्या सामने आई कि भारतीयों को शिक्षा देने के लिए किस भाषा को माध्यम बनाया जाए। लॉर्ड मैकाले अंग्रेजी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने का समर्थक था, लेकिन कुछ अंग्रेज संस्कृत, बंगला या हिन्दी को शिक्षा प्रदान करने का माध्यम बनाने के पक्ष में थे। अन्त में यह समस्या बेण्टिंक के सामने रखी गई। इस समस्या के समाधान हेतु एक कमेटी बनाई गई, जिसका अध्यक्ष लॉर्ड मैकाले को नियुक्त किया गया। लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाने के अनेक लाभ बताए, अत: 1835 ई. में लॉर्ड मैकाले का अंग्रेजी में शिक्षा देने का प्रस्ताव पारित हो गया। इसके पश्चात् कलकत्ता में एक मेडिकल कॉलेज, आगरा में एक कॉलेज तथा कुछ अन्य स्थानों पर भी कॉलेज खोले गए। बेण्टिंक के प्रयासों के फलस्वरूप भारतीय शिक्षा प्रणाली तो उन्नत अवस्था में न पहुँच सकी, परन्तु अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने से भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना अवश्य जाग्रत हो गई।
निःसन्देह लॉर्ड विलियम बेण्टिंक उच्च कोटि का सुधारक और कुशल प्रशासक था। उसके सुधारों के परिणामस्वरूप ही भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना की भावना जाग्रत हुई थी। लॉर्ड विलियम बेण्टिंक का सात वर्ष का शासनकाल भारतीय इतिहास में 'सुधारों का काल' के नाम से विख्यात है। उसके सम्बन्ध में एक विद्वान् ने लिखा है-"विलियम बेण्टिंक को अपने सुधारों के कारण भारत का ग्लैडस्टोन' कहा जाता है।"


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