मुगल साम्राज्य - पतन के कारण

B.A.II-History I
प्रश्न 13. मुगल साम्राज्य के पतन के कारण बताइए। मुगल साम्राज्य के पतन के लिए औरंगजेब कहाँ तक उत्तरदायी था?
अथवा "औरंगजेब ने अपनी मृत्यु से पूर्व ही साम्राज्य का विनाश कर दिया था।" इस कथन की व्याख्या कीजिए।
अथवा ''मुगलों के पतन के कारणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर - भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना 1526 . में बाबर ने की थी। उसके पश्चात् बाबर के वंशजों ने अपनी वीरता, साहस, योग्यता एवं कूटनीति के द्वारा मुगल साम्राज्य का विस्तार किया तथा उसे संगठित भी किया। अकबर, जहाँगीरशाहजहाँ के शासनकाल में देश का सर्वतोन्मुखी विकास हुआ था, किन्तु 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् यह साम्राज्य विघटित होता गया और शीघ्र ही उसका पतन हो गया।

मुगल साम्राज्य के पतन के कारण-
Mughal samarjya ke patan ke karan

औरंगजेब का उत्तरदायित्व मुगल साम्राज्य के पतन के मुख्य कारण निम्नलिखित थे-

(1) औरंगजेब की शासन नीति -

मुगल साम्राज्य के पतन के लिए औरंगजेब के व्यक्तिगत चरित्र एवं शासन नीति को मुख्य रूप से उत्तरदायी माना जा सकता है। औरंगजेब एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसने अपने शासनकाल में शिया मुसलमानों, हिन्दुओं, सिक्खों तथा अन्य धर्मावलम्बियों पर अनेक प्रकार के अत्याचार किए। उसने हिन्दुओं के मन्दिरों को तुड़वाकर मस्जिदों का निर्माण करवाया। राजपूत राजा जसवन्त सिंह के पुत्रों को मुसलमान बनाने का प्रयास किया। उसकी कट्टर धार्मिक नीति के कारण भारत की हिन्दू जनता, विशेष रूप से जाट, मराठे व राजपूत औरंगजेब के विरुद्ध हो गए और उन्होंने मुगल शासन को समाप्त करने का संकल्प लेकर विद्रोह करना प्रारम्भ कर दिया। इन विद्रोहों ने, सुदृढ़ व संगठित मुगल शासन की नींव को हिला दिया।


(2) औरंगजेब की दक्षिण नीति-

औरंगजेब की दक्षिण नीति भी दिशाहीन एवं सिद्धान्तहीन थी। उसने बीजापुर और गोलकुण्डा के शिया राज्यों
की शक्ति को नष्ट कर दिया। इसके फलस्वरूप दक्षिण में मराठों को अपना प्रभाव बढ़ाने एवं संगठित होने का सुअवसर प्राप्त हो गया। यदि औरंगजेब ने बीजापुर और गोलकुण्डा के शासकों के साथ सहयोग की नीति अपनाई होती, तो दक्षिण में मराठों की शक्ति को नष्ट करने में ये राज्य औरंगजेब की सहायता अवश्य करते। इस प्रकार औरंगजेब की शासन नीति का मुगल साम्राज्य की शक्ति व संगठन पर विपरीत प्रभाव पड़ा, जिसके कारण मुगल साम्राज्य दिन-प्रतिदिन पतन के मार्ग पर अग्रसर होता गया।

(3) अयोग्य उत्तराधिकारी-

औरंगजेब के शासनकाल में उत्पन्न अव्यवस्था और अराजकता को रोकने के लिए उत्तराधिकारियों की योग्यता आवश्यक थी। उस स्थिति पर अकबर जैसा योग्य एवं दूरदर्शी सम्राट ही नियन्त्रण पा सकता था। किन्तु दुर्भाग्यवश औरंगजेब के उत्तराधिकारियों में इस प्रकार की प्रशासनिक योग्यता व क्षमता का नितान्त अभाव था। उनमें बाबर व अकबर जैसा शारीरिक बल भी नहीं था। उनका आचरण भोग-विलास से पूर्ण होने के कारण वे साम्राज्य पर नियन्त्रण एवं शासन का संचालन करने में सफल नहीं हो सके। उन्होंने शासन की बुराइयों को दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया। फलस्वरूप मुगल साम्राज्य की शक्ति निरन्तर क्षीण होती गई और एक दिन उसका सर्वनाश हो गया।  

(4) आर्थिक दुर्बलता-

मुंगल सम्राटों की साम्राज्यवादी नीति के कारण सरकारी खजाना निरन्तर खाली होता गया। औरंगजेब के शासनकाल में आर्थिक संकट उस समय अधिक गहरा हो गया जब उसने दक्षिणी राज्यों के विजय अभियान में अपार धन का अपव्यय किया। औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् उसके उत्तराधिकारियों ने शाही खजाने को सम्पन्न बनाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया, बल्कि उनकी विलासिता एवं अधिक खर्च करने की आदत ने आर्थिक समस्या को और अधिक जटिल बना दिया। धीरे-धीरे इस समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया। जनता त्राहि-त्राहि करने लगी। यहाँ तक कि राजमहल में रानियाँ व राजपरिवार के अन्य सदस्य भी भूखों मरने लगे। आर्थिक दुर्बलता की यह स्थिति अधिक दिनों तक मुगल साम्राज्य को जीवित नहीं रख सकी।

(5) सैनिक अव्यवस्था एवं अनुशासनहीनता-

औरंगजेब के शासनकाल के पश्चात् सैन्य संगठन शिथिल हो गया था। उसके उत्तराधिकारी स्वयं अयोग्य थे। उन्होंने सैनिकों की व्यवस्था एवं अनुशासन पर कोई ध्यान नहीं दिया। शराब तथा.. अन्य मादक पदार्थों का सेवन करने से मुगल सैनिक अत्यन्त दुर्बल होते गए। उनमें नैतिक एवं शारीरिक बल समाप्त हो गया। अकबर द्वारा प्रचलित की गई मनसबदारी प्रथा में अनेक दोष आ गए। बड़े-बड़े जमींदारों और सामन्तों को सेना में मनसबदारों का पद दिया जाता था। इन मनसबदारों में सैन्य कुशलता एवं संगठन क्षमता का अभाव होने के कारण सैनिकों में आलस्य एवं दुर्बलता उत्पन्न होना स्वाभाविक था। धीरे-धीरे अनुशासनहीनता भी बढ़ती गई। ऐसी अनुशासनहीन सैनिकों की भीड़ पर यदि सुसंगठित तथा युद्ध संचालन में निपुण सेनापतियों वाली विदेशी सेना ने अधिकार प्राप्त कर लिया, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात रही थी।

(6) अमीरों व सरदारों का नैतिक पतन

औरंगजेब से पहले मुगल शासकों को मुगल सरदारों व अमीरों का पर्याप्त सहयोग मिला था, जिसके परिणामस्वरूप अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ को अपने समय में मुगल साम्राज्य को स्थायी और सुदृढ़ बनाने में सफलता मिली। परन्तु औरंगजेब के समय में इन सरदारों का नैतिक पतन हो गया था।

(7) रिक्त राजकोष- 

शाहजहाँ द्वारा भवनों के निर्माण और औरंगजेब के दक्षिण अभियान में अत्यधिक धन व्यय हुआ। इससे मुगलों का राजकोष लगभग खाली हो गया था और देश की आर्थिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई।

(8) मुगल साम्राज्य का विस्तृत होना

औरंगजेब के शासनकाल में मुगल साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार हुआ, लेकिन उसका परिणाम लाभकारी न रहा। दक्षिण की रियासतों के मुगल साम्राज्य में मिल जाने के कारण उत्तर से दक्षिण तक इस विशाल साम्राज्य का शासन केन्द्रीय शासन व्यवस्था द्वारा सुचारु रूप से संचालित नहीं हो सका, जिसके परिणामस्वरूप औरंगजेब के समय में ही अनेक प्रान्तों के शासकों द्वारा विद्रोह प्रारम्भ हो गया।

(9) औरंगजेब की राजपूतों के प्रति नीति - 

औरंगजेब से पहले अकबर आदि शासकों ने राजपूतों के चारित्रिक गुणों को भलीभाँति समझा और उन्हें मित्र बनाया, जिसके कारण साम्राज्य को शक्तिशाली एवं स्थायी बनाने में सहयोग मिला। किन्तु औरंगजेब ने अपनी धर्मान्धता के कारण भारत की सबसे शक्तिशाली राजपूत जाति की उपेक्षा की, परिणामस्वरूप राजपूत मुगलों के शत्रु बन गए।

(10) विदेशी आक्रमण- 

मुगल शासनकाल में भारत पर दो प्रमुख आक्रमण अहमदशाह अब्दाली और नादिरशाह ने किए। इन्होंने यहाँ भयंकर कत्लेआम किया और अपार धन लूटा। इसके अतिरिक्त भारत की समृद्धि से प्रभावित होकर यूरोप के अनेक देशों के व्यापारियों ने यहाँ अपने अड्डे बना लिए। इनमें डच, पुर्तगाली, फ्रांसीसी एवं अंग्रेज प्रमुख थे। इन्होंने सुदृढ़ स्थिति प्राप्त कर साम्राज्य स्थापित करना शुरू कर दिया। इससे मुगल साम्राज्य को काफी क्षति पहुँची। ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने तो मुगल साम्राज्य के पतन में प्रभावकारी भूमिका निभाई। 1757 ई. के प्लासी के युद्ध के पश्चात् तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों में इस देश की बागडोर आ गई।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि मुगल साम्राज्य के पतन के लिए औरंगजेब सबसे अधिक उत्तरदायी था। उसने स्वयं के विनाश के साथ-साथ इस विशाल साम्राज्य को भी पतन के गर्त में धकेल दिया।


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