भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विकास - 1885 से 1905

MJPRU-BA-III-History I-2020
प्रश्न 14भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक उद्देश्य एवं कार्यक्रमों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
अथवा ''भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रारम्भिक नीतियों एवं कार्यक्रमों का वर्णन कीजिए।
अथवा ''भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की 1885 से 1905 तक की नीतियों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना दिसम्बर1885 में की गई। इसकी स्थापना से 20 वर्ष तक का काल (1885-1905) उदारवादी राष्ट्रीयता का युग माना जाता है। इस अवधि में कांग्रेस का नेतृत्व सुरेन्द्रनाथ बनर्जीदादाभाई नौरोजीफिरोजशाह मेहताबदरुद्दीन तय्यबजी आदि ने किया। इन्होंने संवैधानिक साधनों के द्वारा राष्ट्रीय आन्दोलन को गति और दिशा प्रदान की। इन नेताओं के हृदय में ब्रिटिश सरकार के प्रति राजभक्ति की भावना थी तथा ब्रिटिश सरकार की न्यायप्रियता तथा ईमानदारी में उन्हें पूरा विश्वास थाइसीलिए इस काल को 'उदारवादी युगकहा जाता है।
congress ki sthapna in hindi

·         1885 से 1905 तक कांग्रेस के उद्देश्य व कार्य

कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष श्री वोमेशचन्द्र बनर्जी ने कांग्रेस के प्रारम्भिक उद्देश्य निम्न प्रकार घोषित किए थे
(1) देश के हित व उन्नति में लगे हुए विभिन्न भागों के कार्यकर्ताओं में पारस्परिक घनिष्ठता और मित्रता बढ़ाना।
(2) सभी देशप्रेमियों में जातिधर्म व प्रान्त सम्बन्धी दूषित संस्कारों को समाप्त करना और राष्ट्रीय एकता की भावना को विकसित करना।
(3) तत्कालीन महत्त्वपूर्ण व आवश्यक सामाजिक प्रश्नों पर भारत केशिक्षित वर्गों के विचारों को अच्छी तरह वाद-विवादों के बाद लिपिबद्ध करना।
(4) आगामी वर्ष के उन साधनों तथा कार्यक्रमों पर विचार करना जिनके अन्तर्गत देश के राजनेता देश-हित सम्बन्धी कार्य कर सकें।

·         कांग्रेस द्वारा प्रस्तुत माँगें

1885 ई. से लेकर सन् 1905 तक कांग्रेस ने सरकार के समक्ष निम्नलिखित माँगें प्रस्तुत की
(1) सेना पर व्यय कम किया जाए। 
(2) भारत मन्त्री की परिषद् को समाप्त किया जाए।
(3) आई. सी. एस. (Indian Civil Service) की परीक्षाएँ इंग्लैण्ड के साथ-साथ भारत में भी हों।
(4) 1861 ई. में स्थापित विधान परिषदों का सुधार व विस्तार किया जाए। 
कालान्तर में कांग्रेस ने जो और माँगें रखींवे इस प्रकार थीं
(1) न्याय और शासन विभाग अलग-अलग हों। 
(2) भारतीयों को सैनिक प्रशिक्षण दिया जाए। 
(3) प्रशासनिक व्ययों में कमी की जाए।
(4) भारतीय उद्योगों को संरक्षण प्रदान किया जाए। 
(5) उच्च पदों पर भारतीयों को भी नियुक्त किया जाए। 
(6) समाचार-पत्रों पर से प्रतिबन्ध हटाया जाए।
(7) अनाज का निर्यात समाप्त किया जाए। 
(8) किसानों को कम ब्याज पर ऋण प्रदान किया जाए। 
(9) भूमि पर लगान की उचित दर निर्धारित की जाए।
(10) कांग्रेस ने 1898 ई. के 'षड्यन्त्रकारी सभा अधिनियमऔर सन् 1904 के अधिकारी भेद अधिनियमको भी समाप्त करने की माँग की।


·         उदारवादी कांग्रेस की नीतियाँ एवं कार्यक्रम

(1) क्रमिक सुधारों में विश्वासकांग्रेस के प्रारम्भिक नेता भारतीय प्रशासन में क्रमिक सुधारों के समर्थक थे। उनका विचार था कि भारतीयों को अपने देश के प्रशासन में धीरे-धीरे भाग लेने का अवसर मिलना चाहिए। इन नेताओं की धारणा थी कि उस समय ऐसे व्यक्ति उपलब्ध नहीं थे जिनके हाथों में देश के प्रशासन को पूरी तरह सौंप दिया जाता। यही कारण है कि कांग्रेस ने पहले अधिवेशन में ही सरकार से यह माँग की थी कि भारतीय प्रशासन में क्रमिक सुधार किए जाएँ। आर. जी. प्रधान ने लिखा है, "कांग्रेस के प्रारम्भिक नेताआदर्शवादी न होकर यथार्थवादी थे। वे क्रमिक सुधारों में विश्वास करते थे। वे न्यूनतम संघर्ष के मार्ग को अपनाना चाहते थे। इसलिए वे अपने प्रस्तावों को नरम तरीके से प्रस्तुत करते थे।"
(2) ब्रिटिश शासन के प्रति राजभक्ति की भावना-कांग्रेस के प्रारम्भिक नेता अंग्रेजी शासन की नीतियों से प्रभावित थे। वे ब्रिटिश शासन की उपलब्धियों को भारत के लिए वरदान समझते थे। उनके हृदय में अंग्रेज सरकार के प्रति राजभक्ति की भावना विद्यमान थी। वे ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहते थे जिसे सरकार अपने विरुद्ध समझे। सरकार को आश्वासन देते हुए कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में अध्यक्ष पद से दादाभाई नौरोजी ने कहा था, "आओहम सब पुरुषों की भाँति घोषणा करें कि हमारा रोम-रोम राजभक्त है।"
(3) ब्रिटिश सरकार की न्यायप्रियता में विश्वास-कांग्रेस के प्रारम्भिक नेताओं को अंग्रेजों की ईमानदारी एवं न्यायप्रियता में पूरा विश्वास था। उनकी यह धारणा थी कि भारतीय प्रशासन के सम्बन्ध में यदि सरकार को सही जानकारी दे दी जाएतो वह हमारी मांगों को शीघ्र पूरा करेगी। इसी प्रकार से प्रभावित होकर उन नेताओं ने नरम से नरम नीति का पालन किया था। बदरुद्दीन तय्यबजी के शब्दों में, "अंग्रेज जाति से बढ़कर ईमानदार और सच्चरित्र जाति सूर्य के प्रकाश के नीचे नहीं मिल सकती।"
(4) संवैधानिक साधनों का प्रयोग- प्रारम्भिक 20 वर्षों में राष्ट्रीय नेताओं ने आन्दोलन के संचालन हेतु संवैधानिक साधनों का प्रयोग किया था। इन साधनों में प्रार्थना-पत्रस्मृति-पत्र एवं प्रतिनिधिमण्डल मुख्य थे। इन नेताओं की कार्य-प्रणाली पूरी तरह संवैधानिक थी। इसकी व्याख्या करते हुए कांग्रेस के तृतीय अधिवेशन में मालवीय जी ने कहा था
"हमें सरकार से बार-बार निवेदन करना चाहिए कि वह हमारी मांगों पर शीघ्रता से विचार करे। इसके पश्चात् अपनी मांगों को स्वीकार करने के लिए हमें स्मृति-पत्र और प्रतिनिधिमण्डल के माध्यम से सरकार पर दबाव डालना चाहिए।"
(5) ब्रिटेन के साथ सम्बन्ध-प्रारम्भिक कांग्रेसी नेता किसी भी प्रकार ब्रिटेन से सम्बन्ध-विच्छेद करने के पक्ष में नहीं थे। गोपालकृष्ण गोखले ने कहा था कि "हमको यह मानना पड़ेगा कि ब्रिटिश शासन विदेशी होने के कारण अपनी कमियों के साथ-साथ देशवासियों की प्रगति में एक बड़ा साधन रहा है। इसके जारी रहने का अर्थ उस शान्ति और व्यवस्था के जारी रहने से है जिन्हें केवल वही कायम रख सकता है जिनके साथ-साथ हमारे श्रेष्ठ हित बँधे हैं।"

·         उदारवादियों की भूलें

(1) ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति गलत धारणाउदारवादी अपने इस विश्वास से नहीं डिगे कि अंग्रेज एक न्यायप्रिय जाति हैभले ही उसने कांग्रेस की छोटी-सी माँग को पूरा न किया हो।
(2) साधनों की दुर्बलता-उदारवादियों ने जिन साधनों को अपनायाउन्हें उग्रवादी नेताओं ने 'सामाजिक भिक्षाका नाम दिया। गुरुमुख निहाल सिंह ने लिखा है कि "तिलक और सम्भवतः गोखले को छोड़कर कांग्रेस के उदार नेताओं में स्वतन्त्रता के लिए व्यक्तिगत बलिदान करने और कष्ट सहने को कोई तैयार नहीं था।"
लाला लाजपत राय ने लिखा है कि "कांग्रेस आन्दोलन में राष्ट्रीय आन्दोलन के तत्त्वों की कमी थी। यह रुक-रुककर चलने वाला एक ऐसा आन्दोलन था जो उसी वर्ग की सहानुभूति व सद्भावना पर निर्भर था जिसके विरुद्ध इसे प्रारम्भ किया गया था। यह आन्दोलन जनता द्वारा न तो संयोजित था और न उसके द्वारा अनुप्राणित।"

·         उदारवादियों की सफलताएँ

उपर्युक्त विवरण से ऐसा नहीं समझ लेना चाहिए कि उदार राष्ट्रीयता का काल महत्त्वहीन है। तत्कालीन परिस्थितियों में उनके वैधानिक सिद्धान्तों को निरर्थक बताना भूल होगी। उनका मार्ग दूरदर्शितापूर्ण व बुद्धिमत्तापूर्ण था। उनकी कुछ सफलताएँ अग्र प्रकार रहीं
·    1892 ई. का 'भारतीय परिषद् अधिनियमकांग्रेस के प्रारम्भिक प्रयत्नों का ही परिणाम था। इस अधिनियग के द्वारा प्रान्तीय विधान परिषदों के सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।
·       1894 ई. में उदारवादियों ने उस कानून को रद्द कराया जिसके द्वारा वकीलों को जिला न्यायाधिकारियों के नियन्त्रण में राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने से रोकने की व्यवस्था थी।
·      उदारवादी नेताओं द्वारा अपनाई गई नीतियाँ और कार्य-प्रणाली तत्कालीन परिस्थिति में उचित थी। उस समय कांग्रेस की जड़ें मजबूत नहीं हुई थीं। ऐसी स्थिति में नेताओं ने उदारवादी नीति को अपनाकर सही निर्णय लिया था। डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है, "यद्यपि उदारवादियों की कार्य-प्रणाली की आलोचना की जाती हैतथापि अपनी सेवाओं के कारण वे प्रशंसा के पात्र हैं। इन प्रतिभाशाली और चरित्रवान देशभक्तों ने विदेशी नौकरशाही के शक्तिशाली होने पर भी भारत के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया था।"
·     (4) उदारवादी नेता राष्ट्रीयता की भावना के जनक थे। उन्होंने कांग्रेस के 'माध्यम से जनता में राष्ट्रीयता की भावना का प्रचार किया था। जी. एन. सिंह ने लिखा है, "प्रारम्भिक कांग्रेस ने भिक्षावृत्ति की कार्य-पद्धति के बावजूद राष्ट्रीय जागृतिराजनीतिक एकता और राष्ट्रीयता की भावना के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया था।"
·        (5) उदारवादियों ने आगामी पीढ़ी के लिए राष्ट्रीय आन्दोलन का महत्त्वपूर्ण आधार बनाया। इसी आधार पर 20वीं शताब्दी का स्वाधीनता संग्राम संचालित किया गया। महान् इतिहासकार पट्टाभि सीतारमैय्या ने इसकी पुष्टि करते हुए लिखा है, "उदारवादियों की नीतियों व कार्य-प्रणाली को हम उसी प्रकार कोई दोष नहीं दे सकतेजिस प्रकार किसी आधुनिक इमारत की नींव में लगे ईंटचूनापत्थर पर कोई दोष नहीं लगाया जा सकता हैक्योंकि वही तो आधार है जिस पर इमारत खड़ी हो सकी। इसी प्रकार उदारवादियों की नीति के आधार पर पूर्ण स्वाधीनता का महल तैयार हुआ था।"
इस प्रकार कांग्रेस के प्रारम्भिक बीस वर्ष किसी रचनात्मक उपलब्धि के न होने पर भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थे। इन्हीं वर्षों में आगामी राष्ट्रीय आन्दोलन के लिए अनुकूल पृष्ठभूमि का निर्माण किया गया। के. एम. मुंशी ने लिखा है
 "यदि पिछले बीस वर्षों में अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस कार्य नहीं कर रही होतीतो गांधीजी का कोई भी आन्दोलन सफल नहीं होता और सरदार पटेल की अध्यक्षता में कांग्रेस इतनी कुशल संस्था सिद्ध नहीं हो सकती थी।"
गुरुमुख निहाल सिंह ने उदार राष्ट्रवाद की महत्ता का उल्लेख इस प्रकार किया है, "प्रारम्भिक कांग्रेस ने राजभक्ति की प्रतिज्ञाओंनरम नीतिनिवेदन और आवेदन ही नहींवरन् भिक्षावृत्ति के बावजूद भी उन दिनों राष्ट्रीय जागरणराजनीतिक शिक्षाभारतीयों को एकता के सूत्र में बाँधने और उनमें सामान्य भारतीय राष्ट्रीयता की भावना का निर्माण करने में बहुत अधिक सहयोग दिया
संक्षेप में कहा जा सकता है कि उदारवादी युग के नेताओं ने स्वतन्त्रता के लिए कोई सीधा आन्दोलन नहीं चलाया। फिर भी उन्होंने उसकी पृष्ठभूमि या नींव तैयार कीजिस पर आगे जाकर स्वतन्त्रता का भवन खड़ा हो सका।


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